01 जून 2011

काल निरंजन की चालबाजी

तब धर्मदास बोले - हे साहिब ! अब आप आगे की बात कहो । चार खानियों की रचना कर फ़िर क्या किया ? यह मुझे स्पष्ट कहो ।
कबीर साहब बोले - हे धर्मदास यह काल निरंजन की चालबाजी है । जिसे पंडित काजी नहीं समझते । और वे इस भक्षक काल निरंजन को भृमवश स्वामी ( भगवान आदि ) कहते हैं । और सत्यपुरुष के नाम ग्यान रूपी अमृत को त्याग कर माया का विषय रूपी विष खाते हैं । इन चारों.. अष्टांगी ( देवी आदिशक्ति ) बृह्मा । विष्णु । महेश । ने मिलकर यह सृष्टि रचना की ।  और उन्होंने जीव की देह को कच्चा रंग दिया । इसीलिये मनुष्य की देह में आयु समय आदि के अनुसार बदलाव होता रहता है । 5 तत्व - प्रथ्वी । जल । वायु । अग्नि । आकाश और 3 गुण - सत । रज । तम से देह की रचना हुयी है । उसके साथ चौदह 14 यम लगाये गये हैं । इस प्रकार मनुष्य देह की रचना कर काल ने उसे मार खाया । तथा फ़िर फ़िर.. उत्पन्न किया । इस तरह मनुष्य सदा जन्म मरण के चक्कर में पङा ही रहता है । ॐकार वेद का मूल अर्थात आधार है । और इस ॐकार में ही संसार भूला भूला फ़िर रहा है ( बल्कि फ़ूला फ़ूला फ़िर रहा है - राजीव ) संसार के लोगों ने ॐकार को ही ईश्वर परमात्मा सब कुछ मान लिया । वे इसमें उलझकर सब ग्यान भूल गये । और तरह तरह से इसी की व्याख्या करने लगे । यह ॐकार ही ( भी ) निरंजन है । परन्तु आदि पुरुष का सत्यनाम जो विदेह है । उसे गुप्त समझो । काल माया से परे वह आदि नाम गुप्त ही है ।
( यह बात एक दृष्टि से सही है । परन्तु मैंने ॐकार द्वारा शरीर बनना बताया है । अतः मेरे नियमित पाठकों को भृम हो सकता है । लेकिन ..सत्यपुरुष ने जीव बीज को " सोहंग " रूप में काल पुरुष को दिया था । तब इस परिवार ने अपनी इच्छानुसार मनुष्य या अन्य जीव बनाये । और काल अदृष्य होकर मन रूप में सब जीवों के भीतर बैठ गया । अतः ये शरीर उसी का है । उसी के अधिकार में है । अतः ॐकार को काल निरंजन कह सकते हैं । क्योंकि अविनाशी " सोहंग " जीव शरीर में रहते हुये भी उससे अलग ही है । )

हे धर्मदास ! फ़िर बृह्मा ने 88 000 ऋषियों को उत्पन्न किया । जिससे काल निरंजन का बहुत प्रभाव बङ गया ( क्योंकि वे उसी का गुण तो गाते हैं ) बृह्मा से जो जीव उत्पन्न हुये । वो ब्राह्मण कहलाये । ब्राह्मणों ने  आगे इसी शिक्षा के लिये शास्त्रों का विस्तार कर दिया ( इससे काल निरंजन का प्रभाव और भी बङा । क्योंकि उनमें उसी की बनाबटी महिमा गायी गयी है )
बृह्मा ने स्मृति । शास्त्र । पुराण आदि धर्म गृन्थों का विस्त्रत वर्णन किया । और उसमें समस्त जीवों को बुरी तरह उलझा दिया ( जबकि परमात्मा को जानने का सीधा सरल आसान रास्ता " सहज योग " है ) जीवों को बृह्मा ने भटका दिया । और शास्त्र में तरह तरह के कर्म कांड । पूजा । उपासना की नियम विधि बताकर जीवों को सत्य से विमुख कर भयानक काल निरंजन के मुँह में डालकर उसी की ( अलख निरंजन ) महिमा को बताकर झूठा ध्यान ( और ग्यान ) कराया । इस तरह " वेद मत " से सब भृमित हो गये । और सत्यपुरुष के रहस्य को न जान सके ।
हे धर्मदास ! निरंकार ( निरंकारी ) निरंजन ने यह कैसा झूठा तमाशा किया । उस चरित्र को भी समझो ।
काल निरंजन आसुरी भाव ( मन द्वारा ) उत्पन्न कर प्रताङित जीवों को सताता है । देवता । ऋषि । मुनि सभी को प्रताङित करता है । फ़िर अवतार ( दिखावे के लिये । निज महिमा के लिये ) धारण कर रक्षक बनता है ( जबकि सबसे बङा भक्षक स्वयँ हैं ) और फ़िर असुरों का संहार ( का नाटक ) करता है । और इस तरह सबसे अपनी महिमा का विशेष गुणगान करवाता है । जिसके कारण जीव उसे शक्ति संपन्न और सब कुछ जानकर उसी से आशा बाँधते हैं कि - यही हमारा महान रक्षक है ???
विशेष - कुछ पाठकों ने कहा था कि लिखा है - अवतार विष्णु लेते हैं ।.. ऐसा काल निरंजन  खुद विष्णु को मायाशक्ति से भरमाता है । यानी खुद को छिपाये रखने हेतु अवतार में जिक्र विष्णु ( खुद विष्णु से भी ) का करता है । और राम ..कृष्ण ये दो अवतार खुद लेता है । यह बात यहाँ स्पष्ट हो गयी । )
वह अपनी रक्षक कला दिखाकर अन्त में सव जीवों का भक्षण कर लेता है ( यहाँ तक कि अपने पुत्र बृह्मा विष्णु महेश को भी नहीं छोङता ) जीवन भर उसके नाम ग्यान जप पूजा आदि के चक्कर में पङा जीव अन्त समय पछताता है । जब काल उसे बेरहमी से खाता है ( मृत्यु से कुछ पहले अपनी आगामी गति पता लग जाती है )
हे धर्मदास ! अब आगे सुनो । बृह्मा ने 68 तीर्थ स्थापित कर पाप पुण्य और कर्म अकर्म का वर्णन किया । फ़िर बृह्मा ने 12 राशि । 27  नक्षत्र । 7 वार और 15 तिथि का विधान रचा । इस प्रकार ज्योतिष शास्त्र की रचना हुयी । अब आगे की बात सुनो ।
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शीघ्र प्रकाशित होगा ।
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