22 मई 2011

मूर्ख संयोग के हाथ में खिलौना होते हैं

मीरदाद - इस रात के सन्नाटे में मीरदाद परमात्मा परमात्मा की ओर जाने वाली राह पर कुछ प्रकाश कण विखेरना चाहता है । विवाद से बचो । सत्य स्वयं प्रमाणित है । उसे किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है । जिसे तर्क और प्रमाण की आवश्यकता होती है । उसे देर सवेर तर्क और प्रमाण के द्वारा ही गिरा दिया जाता है । किसी बात को सिद्ध करना उसके प्रतिपक्ष को खंडित करना है । उसके प्रतिपक्ष को सिद्ध करना । उसका खंडन करना है । परमात्मा का कोई प्रतिपक्ष है ही नहीं । फिर तुम कैसे उसे सिद्ध करोगे । या कैसे उसका खंडन करोगे ? यदि जिह्वा को सत्य का वाहक बनाना चाहते हो । तो उसे कभी मूसल, विषदंत, वातसूचक, कलाबाज या सफाई करने वाला नहीं बनाना चाहिए ।
बेजबानों को राहत देने के लिये बोलो । अपने आपको राहत देने के लिये मौन रहो । शब्द जहाज हैं । जो स्थान के समुद्रों में चलते हैं । और अनेक बंदरगाहों पर रुकते हैं । सावधान रहो कि तुम उनमे क्या लादते हो ? क्योंकि अपनी यात्रा समाप्त करने के बाद वे अपना माल आखिर तुम्हारे द्वार पर ही उतारेंगे । घर के लिए जो महत्व झाड़ू का है । वही महत्व ह्रदय के लिए आत्मनिरीक्षण का है । अपने ह्रदय को अच्छी तरह बुहारो । अच्छी तरह बुहारा गया ह्रदय 1 अजेय दुर्ग है । जैसे तुम लोगों और पदार्थों को अपना आहार बनाते हो । वैसे ही वे तुम्हें अपना आहार बनाते हैं । यदि तुम चाहते हो कि तुम्हे विष न मिले । तो दूसरों के लिए स्वास्थ्य प्रद भोजन बनो । जब तुम्हे अगले कदम के विषय में संदेह हो । निश्छल खड़े रहो । जिसे तुम नापसंद करते हो । वह तुम्हे नापसंद करता है । उसे पसंद करो । और ज्यों का त्यों रहने दो । इस प्रकार तुम अपने रास्ते से 1 बाधा हटा दोगे । सबसे अधिक असहय परेशानी है किसी बात को परेशानी समझना । अपनी पसंद का चुनाव कर लो । हर वस्तु का स्वामी बनना है । या किसी का भी नहीं । बीच का कोई मार्ग सम्भव नहीं । रास्ते का हर रोड़ा 1 चेतावनी है । चेतावनी को अच्छी तरह पढ़ लो । और रास्ते का रोड़ा प्रकाश स्तम्भ बन जायेगा । सीधा टेढ़े का भाई है । 1 छोटा रास्ता है दूसरा घुमावदार । टेढ़े के प्रति धैर्य रखो । विश्वास युक्त धैर्य स्वास्थ्य है । विश्वास रहित धैर्य अर्धांग है । होना । महसूस करना । सोचना । कल्पना करना । जानना । यह हैं मनुष्य के जीवन चक्र के मुख्य पड़ावों का क्रम । प्रशंसा करने और पाने से बचो । जब प्रशंसा सर्वथा निश्छल और उचित हो तब भी । जहाँ तक चापलूसी का सम्बन्ध है । उसकी कपट पूर्ण कसमों के प्रति गूंगे और बहरे बन जाओ । देने का एहसास रखते हुए कुछ भी देना उधार लेना ही है । वास्तव में तुम ऐसा कुछ भी नहीं दे सकते । जो तुम्हारा है । तुम लोगों को केवल वही देते हो । जो तुम्हारे पास उनकी अमानत है । जो तुम्हारा है । सिर्फ तुम्हारा ही । वह तुम दे नहीं सकते । चाहो तो भी नहीं । अपना संतुलन बनाये रखो । और तुम मनुष्यों के लिए अपने आपको नापने का मापदण्ड और तौलने की तराजू बन जाओ । गरीबी और अमीरी नाम की कोई चीज नहीं है । बात वस्तुओं का उपयोग करने के कौशल की है । असल में गरीब वह है । जो उन वस्तुओं का जो उसके पास हैं । गलत उपयोग करता है । अमीर वह है । जो अपनी वस्तुओं का सही उपयोग करता है । बासी रोटी की सूखी पपड़ी भी ऐसी दौलत हो सकती है । जिसे आंका न जा सके । सोने से भरा तहखाना भी ऐसी गरीबी हो सकता है । जिससे छुटकारा न मिल सके । जहाँ बहुत से रास्ते 1 केंद्र में मिलते हों । वहाँ इस अनिश्चय में मत पड़ो कि किस रास्ते से चला जाये । प्रभु की खोज में लगे ह्रदय को सभी रास्ते प्रभु की ओर लेजा रहे हैं । जीवन के सब रूपों के प्रति आदर भाव रखो । सबसे तुच्छ रूप में सबसे अधिक महत्वपूर्ण रूप की कुंजी छुपी छिपी रहती है । जीवन की सब कृतियां महत्वपूर्ण हैं - हाँ, अदभुत, श्रेष्ठ और अद्वितीय । जीवन अपने आपको निरर्थक तुच्छ कामों में नहीं लगाता । प्रकृति के कारखाने में कोई वस्तु तभी बनती है । जब वह प्रकृति की प्रेम पूर्ण देखभाल और श्रम पूर्ण कौशल की अधिकारी हो । तो क्या वह कम से कम तुम्हारे आदर की अधिकारी नहीं होनी चाहिए ?
यदि मच्छर और चींटियां आदर के योग्य हों । तो तुम्हारे साथी मनुष्य उनसे कितने अधिक आदर के योग्य होने चाहिये ? किसी मनुष्य से घृणा न करो । 1 भी मनुष्य से घृणा करने की अपेक्षा । प्रत्येक मनुष्य से घृणा पाना कहीं अच्छा है । क्योंकि किसी मनुष्य से घृणा करना । उसके अंदर के लघु परमात्मा से घृणा करना है । किसी भी मनुष्य के अंदर लघु परमात्मा से घृणा करना । अपने अंदर के लघु परमात्मा से घृणा करना है । वह व्यक्ति भला अपने बंदरगाह तक कैसे पहुँचेगा । जो बंदरगाह तक ले जाने वाले अपने एकमात्र मल्लाह का अनादर करता हो ? नीचे क्या है ? यह जानने के लिये ऊपर दृष्टि डालो । ऊपर क्या है ? यह जानने के लिये नीचे दृष्टि डालो । जितना ऊपर चढ़ते हो । उतना ही नीचे उतरो । नहीं तो तुम अपना संतुलन खो बैठोगे । आज तुम शिष्य हो । कल तुम शिक्षक बन जाओगे । अच्छे शिक्षक बनने के लिये अच्छे शिष्य बने रहना आवश्यक है । संसार में से बदी के घांस पात को उखाड़ फेंकने का यत्न न करो । क्योंकि घास पात की भी अच्छी खाद बनती है । उत्साह का अनुचित प्रयोग बहुधा उत्साही को ही मार डालता है । केवल ऊँचे और शानदार वृक्षों से ही जंगल नहीं बन जाता । झाड़ियां और लिपटती लताओं की भी आवश्यकता होती है । पाखण्ड पर पर्दा डाला जा सकता है । लेकिन कुछ समय के लिए ही । उसे सदा ही परदे में नहीं रखा जा सकता । न ही उसे हटाया या नष्ट किया जा सकता है । दूषित वासनाएं अंधकार में जन्म लेती हैं । और वहीँ फलती फूलती हैं । यदि तुम उन्हें नियंत्रण में रखना चाहते हो । तो उन्हें प्रकाश में आने की स्वतन्त्रता दो । यदि तुम 1000 पाखण्डियों में से 1 को भी सहज ईमानदारी की राह पर वापस लाने में सफल हो हो जाते हो । तो सचमुच महान है तुम्हारी सफलता । मशाल को ऊँचे स्थान पर रखो । और उसे देखने के लिये लोगों को बुलाते न फिरो । जिन्हे प्रकाश कि आवश्यकता है । उन्हें किसी निमंत्रण की आवश्यकता नहीं होती । बुद्धिमत्ता अधूरी बुद्धि वाले के लिये बोझ है । जैसे मूर्खता मूर्ख के लिये बोझ है । बोझ उठाने में अधूरी बुद्धि वाले की सहायता करो । और मूर्ख को अकेला छोड़ दो । अधूरी बुद्धि वाला मूर्ख को तुमसे अधिक सिखा सकता है । कई बार तुम्हे अपना मार्ग दुर्गम, अंधकारपूर्ण और एकाकी लगेगा । अपना इरादा पक्का रखो । और हिम्मत के साथ कदम बढ़ाते जाओ । और हर मोड़ पर तुम्हें 1 नया साथी मिल जायेगा । पथ विहीन स्थान में ऐसा कोई पथ नहीं । जिस पर अभी तक कोई न चला हो । जिस पथ पर पदचिन्ह बहुत कम और दूर दूर हैं । वह सीधा और सुरक्षित है । चाहे कहीं कहीं उबड़ खाबड़ और सुनसान है । जो मार्गदर्शन चाहते हैं । उन्हें मार्ग दिखा सकते है । उस पर चलने के लिए विवश नहीं कर सकते । याद रखो - तुम मार्गदर्शक हो । अच्छा मार्गदर्शक बनने के लिये आवश्यक है कि स्वयं अच्छा मार्गदर्शन पाया हो । अपने मार्गदर्शक पर विश्वास रखो । कई लोग तुमसे कहेंगे - हमें रास्ता दिखाओ । किन्तु थोड़े ही बहुत ही थोड़े कहेंगे - हम तुमसे विनती करते हैं कि रास्ते में हमारी रहनुमाई करो । आत्मविजय के मार्ग में वे थोड़े से लोग उन कई लोगों से अधिक महत्व रखते हैं । तुम जहाँ चल न सको - रेंगो । जहाँ दौड़ न सको - चलो । जहाँ उड़ न सको - दौड़ो । जहाँ समूचे विश्व को अपने अंदर रोककर खड़ा न कर सको - उड़ो । जो व्यक्ति तुम्हारी अगुआई में चलते हुए ठोकर खाता है । उसे केवल 1 बार 2 बार या 100 बार ही नहीं । उठाओ । याद रखो कि तुम भी कभी बच्चे थे । और उसे तब तक उठाते रहो । जब तक वह ठोकर खाना बन्द न कर दे । अपने ह्रदय और मन को क्षमा से पवित्र कर लो । ताकि जो भी सपने तुम्हे आयें । वे पवित्र हों । जीवन 1 ज्वर है । जो हर मनुष्य की प्रवृति या धुन के अनुसार भिन्न भिन्न प्रकार का और भिन्न भिन्न मात्रा में होता है । और इसमें मनुष्य सदा प्रलाप की अवस्था में रहता है । भाग्यशाली हैं वे मनुष्य । जो दिव्य ज्ञान से प्राप्त होने वाली पवित्र स्वतंत्रता के नशे में उन्मत्त रहते हैं । मनुष्य के ज्वर का रूप परिवर्तन किया जा सकता है । युद्ध के ज्वर को शान्ति के ज्वर में बदला जा सकता है । और धन संचय के ज्वर को प्रेम का संचय करने के ज्वर में । ऐसी है दिव्य ज्ञान की वह रसायन विद्या । जिसे तुम्हें उपयोग में लाना है । और जिसकी तुम्हे शिक्षा देनी है । जो मर रहे हैं । उन्हें जीवन का उपदेश दो । जो जी रहे हैं । उन्हें मृत्यु का । किन्तु जो आत्मविजय के लिए तड़प रहे हैं । उन्हें दोनों से मुक्ति का उपदेश दो । वश में रखने और वश में होने में बड़ा अंतर है । तुम उसी को वश में रखते हो । जिससे तुम प्यार करते हो । जिससे तुम घृणा करते हो । उसके तुम वश में होते हो । वश में होने से बचो । समय और स्थान के विस्तार में 1 से अधिक पृथ्वियां अपने पथ पर घूम रहीं हैं । तुम्हारी पृथ्वी इस परिवार में सबसे छोटी है । और यह बड़ी हृष्ट पुष्ट बालिका है । 1 निश्चल गति - कैसा विरोधाभास है । किन्तु परमात्मा में संसारों की गति ऐसी ही है । यदि तुम जानना चाहते हो कि छोटी बड़ी वस्तुएं बराबर कैसे हो सकती हैं ? तो अपने हाथों की अँगुलियों पर दृष्टि डालो । संयोग बुद्धिमानों के हाथ में 1 खिलौना है । मूर्ख संयोग के हाथ में खिलौना होते हैं । कभी किसी चीज की शिकायत न करो । किसी चीज की शिकायत करना । उसे अपने आपके लिये अभिशाप बना लेना है । उसे भली प्रकार सहन कर लेना । उसे उचित दण्ड देना है । किन्तु उसे समझ लेना । उसे 1 सच्चा सेवक बना लेना है । प्रायः ऐसा होता है कि शिकारी लक्ष्य किसी हिरनी को बनाता है । परन्तु लक्ष्य चूकने से मारा जाता है । कोई खरगोश जिसकी उपस्थिति का उसे बिलकुल ज्ञान न था । ऐसी स्थिति में 1 समझदार शिकारी कहेगा - मैंने वास्तव में खरगोश को ही लक्ष्य बनाया था । हिरनी को नहीं । और मैंने अपना शिकार मार लिया । लक्ष्य अच्छी तरह से साधो । परिणाम जो भी हो । अच्छा ही होगा । जो तुम्हें पास आ जाता है । वह तुम्हारा है । जो आने में विलम्ब करता है । वह इस योग्य नहीं कि उसकी प्रतीक्षा की जाये । प्रतीक्षा उसे करने दो ।
जिसका निशाना तुम साधते हो । यदि वह तुम्हें निशाना बना ले । तो तुम निशाना कभी नहीं चूकोगे । चूका हुआ निशाना सफल निशाना होता है । अपने ह्रदय को निराशा के सामने अभेद्य बना लो । निराशा वह चील है । जिसे दुर्बल ह्रदय जन्म देते हैं । और विफल आशाओं के सड़े गले मांस पर पालते हैं । 1 पूर्ण हुई आशा कई मृत जात आशाओं को जन्म देती है । यदि तुम अपने ह्रदय को कब्रिस्तान नहीं बनाना चाहते । तो सावधान रहो । आशा के साथ उसका विवाह मत करो । हो सकता है । किसी मछली के दिए 100 अण्डों में से केवल 1 में से बच्चा निकले । तो भी बाकी 99 व्यर्थ नहीं जाते । प्रकृति बहुत उदार है । और बहुत विवेक है - उसकी विवेकहीनता में । तुम भी लोगों के ह्रदय और बुद्धि में अपने ह्रदय और बुद्धि को बोने में उसी प्रकार उदार और विवेक पूर्वक विवेकहीन बनो ।  किसी भी परिश्रम के लिए पुरस्कार मत माँगो । जो अपने परिश्रम से प्यार करता है । उसका परिश्रम स्वयं पर्याप्त पुरस्कार है । सृजनहार शब्द तथा पूर्ण संतुलन को याद रखो । जब तुम दिव्य ज्ञान के द्वारा यह संतुलन प्राप्त कर लोगे । तभी तुम आत्मविजेता बनोगे । और तुम्हारे हाथ प्रभु के हाथों के साथ मिलकर कार्य करेंगे । परमात्मा करे । इस रात्रि की नीरवता और शान्ति का स्पन्दन तुम्हारे अंदर तब तक होता रहे । जब तक तुम उन्हें दिव्य ज्ञान की नीरवता और शान्ति में डुबा न दो । यही शिक्षा थी मेरी नूह को । यही शिक्षा है मेरी तुम्हें । अध्याय 35  परमात्मा की राह पर प्रकाश कण
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