25 अप्रैल 2011

ज्ञान में ही धर्म है के फूल लगते हैं

1 सूफी फकीर निरंतर कहा करता था कि - परमात्मा तेरा धन्यवाद । अहोभाग्य है मेरे कि जब मेरी जो जरूरत होती है । तू तत्क्षण पूरी कर देता है । उसके शिष्य उससे धीरे धीरे परेशान हो गए । यह बात सुन सुनकर । क्योंकि वे कुछ देखते नहीं थे कि कौन सी जरूरत पूरी हो रही है ? फकीर गरीब था । शिष्य भूखे मरते थे । कुछ उपाय न था । और यह रोज सुबह सांझ 5 बार मुसलमान फकीर 5 बार प्रार्थना करे । और 5 बार भगवान को धन्यवाद देता । और ऐसे अहोभाव से । तो शिष्यों को लगता कि यह भी क्या मामला है ? 1 दिन हद हो गई । यात्रा पर थे, तीर्थयात्रा के लिए जा रहे थे । 3 दिन से भूखे प्यासे थे । 1 गांव में सांझ थके मांदे आए । गांव के लोगों ने ठहराने से इनकार कर दिया । तो वृक्षों के नीचे भूखे थके मांदे पड़े हैं । और आखिरी प्रार्थना का क्षण आया । कोई उठा नहीं । क्या प्रार्थना करनी है ? किससे प्रार्थना करनी है ? हो गई बहुत प्रार्थना । यह क्षण नहीं था प्रार्थना का । लेकिन गुरु उठा । उसने हाथ जोड़े । वही अहोभाव कि - धन्यवाद परमात्मा ! जब भी मेरी जो भी जरूरत होती है । तू तभी पूरी कर देता है । 1 शिष्य से यह बर्दाश्त न हुआ । उसने कहा - बंद करो बकवास । यह हम बहुत सुन चुके । अब आज तो यह बिलकुल ही असंगत है । 3 दिन से भूखे प्यासे हैं । छप्पर सिर पर नहीं है । ठंडी रेगिस्तानी रात में बाहर पड़े हैं । किस बात का धन्यवाद दे रहे हो ? उस फकीर ने कहा - आज गरीबी मेरी जरूरत थी । आज भूख मेरी जरूरत थी । वह उसने पूरी की । आज नगर के बाहर पड़े रहना मेरी जरूरत थी । आज गांव मुझे स्वीकार न करे । यह मेरी जरूरत थी । और अगर इस क्षण में उसे धन्यवाद न दे पाया । तो मेरे सब धन्यवाद बेकार हैं । क्योंकि जब वह तुम्हें कुछ देता है । जो तुम्हारी मन के अनुकूल है । तब धन्यवाद का क्या अर्थ ? जब वह तुम्हें कुछ देता है । जो तुम्हारे मन के अनुकूल नहीं है । तभी धन्यवाद का कोई अर्थ है । और जब उसने दिया है । तो जरूर मेरी जरूरत होगी । अन्यथा वह देगा ही क्यों ? आज यही जरूरी होगा मेरे जीवन उपक्रम में । मेरी साधना में । मेरी यात्रा में कि आज मैं भूखा रहूं कि गांव अस्वीकार कर दे कि रेगिस्तान में खुली रात, ठंडी रात पड़ा रहूं । आज यही थी जरूरत । और अगर इस जरूरत को उसने पूरा किया है । और मैं धन्यवाद न दूं । तो बात ठीक न होगी । ऐसे व्यक्ति को ही परमात्मा उपलब्ध होता है । तो तुम जब उदास हो । तो समझ लो कि यही थी तुम्हारी जरूरत । आज परमात्मा ने चाहा है कि उदासी में नाचो । पर नाच नहीं रुके । धन्यवाद बंद न हो । उत्सव जारी रहे । ओशो
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धर्म - कोई धर्म के संबंध में पूछ रहा था । उससे मैंने कहा - धर्म का संबंध इससे नहीं है कि आप उसमें विश्वास करते हैं । या नहीं करते । वह आपका विश्वास नहीं । आपका स्वांस प्रश्वास हो । तो ही सार्थक है । वह तो कुछ है - जो आप करते हैं । या नहीं करते हैं । जो आप होते हैं । या नहीं होते हैं । धर्म कर्म है । वक्तव्य नहीं । और धर्म कर्म तभी होता है । जब वह आत्मा बन गया हो । जो आप करते हें । वह आप पहले हो गये होते हें । सुवास देने के पहले फूल बन जाना आवश्यक है । फूलों की खेती की भांति आत्मा की खेती भी करनी होती है । और, आत्मा में फूलों को जगाने के लिए पर्वतों पर जाना आवश्यक नहीं है । वे तो जहां आप हैं । वहीं उगाये जा सकते हैं । स्वयं के अतिरिक्त एकांत में ही पर्वत हैं । और अरण्य हैं । यह सत्य है कि पूर्ण एकांत में ही सत्य और सौंदर्य के दर्शन होते हैं । और जीवन में जो भी श्रेष्ठ है । वह उन्हें मिलता है । जो अकेले होने का साहस रखते हैं । जीवन के निगूढ़ रहस्य एकांत में ही अपने द्वार खोलते हैं । और आत्मा प्रकाश को और प्रेम को उपलब्ध होती है । और जब सब शांत और एकांत होता है । तभी वे बीज अंकुर बनते हैं । जो हमारे समस्त आनंद को अपने में छिपाये हमारे व्यक्तित्व की भूमि में दबे पड़े हैं । वह वृद्धि, जो भीतर से बाहर की ओर होती है । एकांत में ही होती है । और स्मरण रहे कि सत्य वृद्धि भीतर से बाहर की ओर होती है । झूठे फूल ऊपर से थोपे जा सकते हैं । पर असली फूल तो भीतर से ही आते हैं ।  इस आंतरिक वृद्धि के लिए पर्वत और अरण्य में जाना आवश्यक नहीं है । पर पर्वत और अरण्य में होना अवश्य आवश्यक है । वहां होने का मार्ग प्रत्येक के ही भीतर है । दिन और रात्रि की व्यस्त दौड़ में थोड़े क्षण निकालें । और अपने स्थान और समय को । और उससे उत्पन्न अपने तथाकथित व्यक्तित्व और " मैं " को भूल जाएं । जो भी चित्त में आये । उसे जानें कि - यह मैं नहीं हूं । और उसे बाहर फेंक दें । सब छोड़ दें । प्रत्येक चीज । अपना नाम । अपना देश । अपना परिवार । सब स्मृति से मिट जाने दें । और कोरे कागज की तरह हो रहें । यही मार्ग आंतरिक एकांत और निर्जन का मार्ग है । इससे ही अंतत: आंतरिक संन्यास फलित होता है ।
चित्त जब सब पकड़ छोड़ देता है । सब नाम रूप के बंधन तोड़ देता है । तब वही आप में शेष रह जाता है । जो आपका वास्तविक होना है । उस ज्ञान में ही धर्म है के फूल लगते हैं । और जीवन परमात्मा की सुवास से भरता है । इन थोड़े क्षणों में जो जाना जाता है । जो शांति और सौंदर्य । और जो सत्य । वह आपको 1 ही साथ 2 तलों पर जीने की शक्ति दे देता है । फिर कुछ बांधता नहीं है । और जीवन मुक्त हो जाता है । जल में होकर भी फिर जल छूता नहीं है । इस अनुभूति में ही जीवन की सिद्धि है । और धर्म की उपलब्धि है ।
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