06 अप्रैल 2011

क्या तुम्हारे भगवान को अपनी पत्नी की पवित्रता पर विश्वास नहीं था ?

राजीव कुमार जी । हमारा नमस्कार स्वीकार करें । हम प्रसाद सेतिया हैं । अब तो आपसे जान पहचान हो ही चुकी है । हम २ बात पूछ्ना चाहते हैं । असल में हम ये बात आपका कोई टेस्ट लेने के लिये नही पूछ रहे ।  मैं अब सीधा बात पर ही आता हूँ ।

कुछ समय पहले की बात है । मेरे जीजाजी का किसी से झगडा हो गया । जिससे झगडा हुआ । वो आदमी ईसाई धर्म का था । ( हिन्दू से ईसाई में परिवर्तित हुआ था ) हम दिल्ली गये । अपने घर के किसी काम से । वहाँ मेरे जीजाजी ने झगडा कर लिया । मैं जानता हूँ कि कैसे मैंने अपने हाथ जोडकर मामला शान्त किया ।

राजीव जी ! वहाँ बात ये हुई कि जीजाजी ने उस आदमी को ( थोडी सी जान पहचान हो जाने के बाद ) पूछ लिया कि - भाई तुम हिन्दू से ईसाई क्यों बन गये ? तुम तो जाति के भी खत्री हो ) तो इतना सुनते ही वो आदमी भडक गया । और लगा हिन्दू धर्म मे कमी निकालने । उसने २ प्रशन जीजाजी से किये । जिनका उत्तर न तो जीजाजी के पास था । और न मेरे पास । उल्टा जीजाजी ने भी ईसामसीह के बारे में कुछ बोल दिया । उसके बाद तो बात बिलकुल झगङे पर आ गयी । लेकिन मैंने बीच में पडकर मामला शान्त किया । और जीजाजी से भी कहा कि आप फ़ालतू के लफ़्डो में न पडा करो ।

लेकिन मैंने बाद में सोचा कि उस आदमी ने जो २ सवाल किये । क्या उनके जवाब है हमारे पास ? क्योंकि जीजाजी ने जो बात बोली कि " कुंवारी औरत के बच्चा कैसे हो सकता है ? " इसका जवाब तो मुझे मिल गया था । आपके १ थोडा पुराने लेख से । लेकिन उस आदमी ने जो २ सवाल किये । मैं उनके जवाब जानना चाहता हूँ । उसने कहा था कि " दुर्योधन बुरा था । तो युधिष्ठर कहाँ का धर्मात्मा था ? कौन आदमी अपनी पत्नी को जुए में लगाता है ? तुम साले जुए में पत्नी को दाव पर लगाने वाले चूतिये को धर्मात्मा बताते हो ? और कृष्ण अगर कोई अवतार थे । तो उसने युधिष्ठर का साथ क्यों दिया ??

राजीव जी फ़िर उस ईसाई ने दुसरा सवाल दाग दिया तोप की तरह । उसने कहा " अगर राम कोई अवतार था । तो उसने पत्नी की अग्निपरीक्षा क्यों ली ? और परीक्षा लेने के बाद भी उसे १ धोबी की बात सुनकर घर से निकाल दिया । क्या तुम्हारे भगवान को अपनी पत्नी की पवित्रता पर विश्वास नहीं था ? और बाद में लव कुश के बडे होने के बाद उनको बेटा भी मान लिया । उसके बाद क्या हुआ । किसी को कुछ पता नही । राम कब मरा ? कैसे मरा ? इसलिए ये सब किसी चूतिये का लिखा हुआ प्राचीन समय का कोई नावल से अधिक कुछ नही । जिसे तुम लोग पता नहीं क्या समझते हो ? )

अब राजीव कुमार जी । हमारी आपसे विनती है कि इन २ सवालों का जवाब शीघ्र लेख में छापे । और आगे से अगर कोई दूसरे धर्म का कोई आदमी अगर ऐसे उल्टे पुल्टे प्रश्न किसी हिन्दू से करे । तो उसके जवाब हमारे पास होने चाहिये । ( वो भी बिना झगडे के ) मुझे आपके उत्तर का शीघ्र इंतजार रहेगा प्रसाद कुमार सेतिया । कानपुर । ई मेल से ।

Q 1 उसने कहा था कि " दुर्योधन बुरा था । तो युधिष्ठर कहाँ का धर्मात्मा था ? कौन आदमी अपनी पत्नी को जुए में लगाता है ? तुम साले जुए में पत्नी को दाव पर लगाने वाले चूतिये को धर्मात्मा बताते हो ?

ANS - वैसे इसके गूढ रहस्यों में तो ये सब खेल विचित्र तरीके से चलता है । जिसमें पिछले संस्कारों की अहम भूमिका होती है । अब रावण को ही लो । अच्छे अच्छे इस बात को स्वीकार करते हैं कि वो उच्चस्तर का विद्वान तपस्वी ब्राह्मण आदि था । खुद श्रीराम भी उसकी इस महत्ता को स्वीकार करते हैं । लेकिन अति कामुकता । दूसरे का धन अपहरण करना । सज्जनों को नाजायाज सताना आदि उसमें दुर्गुण भी थे ।

एक कामुकता । प्रेस्टिज की हठधर्मिता के चलते उसका सर्वनाश हो गया । अब ऐसे आदमी को विद्वान अक्लमन्द कैसे कह सकते हैं ? लेकिन फ़िर भी कहा जाता है । दरअसल दुर्गुण उसके स्वभाव में शामिल थे । वो अपनी जिन्दगी कैसे जीता है ? यह उसकी खुद की इच्छा पर निर्भर है ।

इसी आधार पर पौराणिक इतिहास युधिष्ठर को धर्मात्मा होने के साथ साथ जुए की लत का दुर्गुणी भी बताते हैं । वे सिर्फ़ उसका यशोगान ही नहीं करते हैं । खुद युधिष्ठर और उसके भाई भी मानते थे कि युधिष्ठर में जुए का दुर्गुण है । लेकिन अन्य स्तरों पर बह वाकई धर्मात्मा थे ।

आजकल बिल क्लिन्टन और मोनिका का उदाहरण ले लो । एक दुर्गुण से ही तो थू थू हुयी । तो इसका ये मतलब नहीं हो जाता कि क्लिंटन में राष्ट्रपति वाले गुण नहीं थे ।
मैं खुद बीङी सिगरेट की स्मोकिंग और मेरे गुरुदेव लकङी की रगङा तम्बाकू खाते हैं । जबकि ये दुर्गुण माने जाते हैं । तो इससे हमारे ग्यान पर क्या असर है ?? साधु के मल से खुशबू आती है क्या ?
इसलिये मेरे भाई ! ग्यान । धर्म । स्वभाव । सामाजिक रहनी सहनी । परिवार । सोच आदि ये सब प्रत्येक व्यक्ति के अलग अलग होते हैं । एक अच्छा डाक्टर जो भयंकर शराबी भी हो । उसे क्या कहा जायेगा ?
1 अच्छा डाक्टर  2 एक नम्बर का बेबङा । ऐसा होता नहीं क्या ?  ऐसा भी होता है ।

अब बात ईसामसीह के ऊपर हुयी । निसंदेह ईसामसीह आत्मग्यानी सन्त थे । उनका बाइबिल दिव्य ग्यान था । लेकिन.. ? ईसामसीह की हिस्ट्री यदि आपको पता हो । तो एक वैश्या उनका ज्यादातर खर्च उठाती थी । उनसे प्रेम भी करती थी । यह भी कहा जाता है कि उनके एक बच्चा भी था आदि आदि । बहुत सारी विवादित बातें कही जाती हैं । और ये सब बातें मैं नहीं । ईसाईयों का ही एक बहुत बङा वर्ग कहता है । जिसकी मान्यता अलग विचारों की है । डिस्कवरी । बीबीसी आदि चैनलों पर अक्सर इस सम्बन्ध में बङी बङी सीरीज अक्सर प्रसारित होती रहती है । लगातार देखने पर किसी दिन देखने को मिल जायेंगी । इंटरनेट पर भी इस तरह की सामग्री निश्चित ही मिल जानी चाहिये ।

Q 2 और कृष्ण अगर कोई अवतार थे । तो उसने युधिष्ठर का साथ क्यों दिया ??

ANS - अब गोलोक के मालिक श्रीकृष्ण उस ईसाई के हिसाब से तो चलने से रहे ।.. हर व्यक्ति के दो या कुछ अधिक रूप उसकी खुद की सामर्थ्य अनुसार होते हैं । मान लीजिये । एक राजा है । और उसका पुत्र किसी अपराध में नामित हो गया । तो वो जब राजा की कुर्सी से बात करेगा । तो न्याय की ही करेगा । लेकिन घर आने पर वो एक आम बाप की तरह अपने पुत्र को बचाने की कोशिश करेगा । इसी तरह श्रीकृष्ण जो सोलह कलाओं के सम्पूर्ण ग्याता थे । उन्होंने राजनीति धर्मनीति कूटनीति फ़ूटनीति आदि सभी का अवसर के अनुसार प्रयोग किया । लेकिन इस प्रश्न के मुख्य भाव के अनुसार उन्होंने दोनों पक्षों को समझाने की भरपूर कोशिश करते हुये युद्ध को टालने की पूरी पूरी कोशिश की । जिसमें युधिष्ठर ने कभी उनकी बात नहीं गिरायी । और दुर्योधन ने कभी उनकी बात न मानी । न कोई महत्व दिया । ऐसी एक नहीं तमाम वजह थीं । जिसके चलते उन्होंने युधिष्ठर का साथ दिया ।
दूसरे..आखिर युधिष्ठर उनकी बुआ का लङका भी था । और जैसे आजकल देशों में युद्ध जैसी हालत हो जाने पर प्रधानमन्त्री आदि अपनी अक्ल और स्वार्थ से एक दूसरे का साथ देते थे । उस समय भी ऐसा ही था । कोई किसी की तरफ़ । कोई किसी की तरफ़ । आगे उनको भी तो ऐसी जरूरत आ सकती है । श्रीकृष्ण ने वैसे स्पष्ट कह दिया था कि एक तरफ़ वो । एक तरफ़ उनकी सेना । यानी उन्होंने दोनों का ही साथ दिया था । अब सयाने दुर्योधन ने ये सोचा कि कृष्ण तो अकेला है । और सेना बहुत है । उसने सेना ली । तो इसमें कृष्ण का क्या दोष ? टास भी उसी ने जीता था । मतलब फ़र्स्ट च्वाइस भी उसी की थी । वैसे उन्होंने नालायक दुर्योधन को समझाने की भी बहुत कोशिश की । पर नही माना । युधिष्ठर कम से कम मान तो जाता था ।

Q 3 राजीव जी फ़िर उस ईसाई ने दुसरा सवाल दाग दिया तोप की तरह । उसने कहा " अगर राम कोई अवतार था । तो उसने पत्नी की अग्निपरीक्षा क्यों ली ? और परीक्षा लेने के बाद भी उसे १ धोबी की बात सुनकर घर से निकाल दिया । क्या तुम्हारे भगवान को अपनी पत्नी की पवित्रता पर विश्वास नहीं था ? और बाद में लव कुश के बडे होने के बाद उनको बेटा भी मान लिया । उसके बाद क्या हुआ । किसी को कुछ पता नही । राम कब मरा ? कैसे मरा ?

ANS - वास्तव में तो ये सब दिव्य शक्तियों की धर्म  संस्थापना हेतु लीला होती है । उसने ऐसा क्यों किया । उसने वैसा क्यों किया । ये साधारण इंसान या मन बुद्धि से नहीं समझा जा सकता । सच्चाई ये थी कि असली सीता को रावण जैसा टुच्चा यदि छूने की कोशिश भी करता ।  तो उसी समय जलकर भस्म हो जाता । ये जलने का गणित भी इस तरह समझो । मान लो किसी भयानक ज्वालामुखी के लावे ( देवी सीता ) में एक तिनका ( रावण )


सीताहरण से पहले ही एक बार जब लक्ष्मण वन को गये हुये थे । तब राम ने सीता से कहा । अब मैं लीला करूँगा । अतः तुम ( योग ) अग्नि में स्थापित हो जाओ । और उस अग्नि से एक माया सीता बाहर आ गयी थी । राम तो खैर त्रिलोकी के राजा थे । कोई भी त्रिकालदर्शी योगी भी जानता है कि भविष्य में क्या होगा ? अतः रावण मरण । लंका विजय । असुर नाश । युद्ध समापन आदि के बाद एक नाटकीय तरीके से असली देवी सीता वापस आ गयीं । सोचने वाली बात है । सीताहरण नहीं होता । तो रामलीला कैसे  होती ?

 माया सीता भी सिर्फ़ 11 महीने लंका में रही थी । उसमें चार महीने चौमासे ( बरसात ) के आ गये । अब उन दिनों आज की तरह रेलगाङी और हवाई जहाज तो चलते नहीं थे । जो सब बन्दर सेना ( हा हा..मैं भी मजाक कर रहा हूँ । वे बन्दर नहीं थे । बल्कि वन प्रान्त और पर्वतीय क्षेत्र में निवास करने वाली वानर रिछ गृद्ध आदि जातियाँ थी । आजकल के आदिवासी क्षेत्रों की तरह उन दिनों भी पिछङे क्षेत्रों में जातियों के नाम पशु वर्ग आदि पर आधारित रख देते थे । ) और राम लक्ष्मण आदि उसमें बैठकर रावण पर धावा बोल देते ।

दो तीन महीने रावण सीता को अपनी महारानी बनाने के लिये फ़ुसलाता रहा । दूसरे उसे शाप लगा हुआ था कि किसी भी स्त्री को वो उसकी रजामन्दी के बिना छुयेगा । तो जलकर भस्म हो जायेगा ।..तो इधर सुग्रीव से सैटिंग बनी । तभी चौमासा आ गया । राम उसी सुग्रीव वाले ऋष्यमूक पर्वत पर ( दिखावे के लिये नकली सीता की याद में रोते ) योग में स्थित रहने लगे । उधर बाली के मरने बाद । क्योंकि सुग्रीव को बहुत दिनों से " औरत " से वंचित रहना पङा था । सो स्वाभाविक ही वो दे दनादन स्टायल में कोटा पूरा करने लगा । चौमासा गुजरते ही हनुमान जी ने सीता का पता लगा लिया था । अब आगे देखिये..पुल इतने दिनों में बना ।


...( इस प्रकार उन्होंने अधिक परिश्रम करके पहले ही दिन 56 कोस लम्बा पुल बना दिया । दूसरे दिन उन्होंने और भी अधिक फुर्ती दिखाई और 84 कोस लम्बा पुल बनाया । फिर अतुल परिश्रम से तीसरे दिन 92 कोस लम्बा सेतु बनाया । इस प्रकार निरन्तर परिश्रम करके उन्होंने 400 कोस लम्बा पुल बना डाला । अब नल-नील के प्रयत्नों से 40 कोस चौड़ा और 400 कोस लम्बा मजबूत पुल बन कर तैयार हो गया । )

 इसका मतलब पूरा पुल पाँच छह दिन में..आठ दिन मान लो भाई ।..अब रावण का हाजमा तो इसी बात पर खराब हो गया कि बन्दर पुल बना रहे हैं । वो भी समुद्र पर । खैर..कुछ दिनों.. रावण से ..अब भी सुधर जा भाई ..क्यों बेमौत मरना चाहता है । इस स्टायल में बात चली । नहीं माना । तो युद्ध छिङ गया । अब बताओ । रावण सीता से रोमांस करता कि उसे अपनी जान बचाने के लाले थे ? इसके बाद रावण भाई टैं ( मर ) हो गये । आगे की बात आप सब जानते ही हो ।

 उसके बाद क्या हुआ । किसी को कुछ पता नही । राम कब मरा ? कैसे मरा ? --

सब पता है भाई । पता क्यों नहीं है । आपको ( मतलब उनको ) नहीं पता । तो वाल्मीकि रामायण का उत्तरकांड पढ लो । राम ने सरयू नदी में स्वयँ का शरीरान्त योग विधि से किया । लक्ष्मण ने भी ऐसा ही किया । सीता प्रथ्वी में समा गयी । बाद में लव कुश और लव कुश के भी लङके नाती आदि उनके खानदानी कोई मथुरा कोई कौशलपुर कोई झुमरीतलैया आदि में राज्य करते रहे । यहाँ तक सीता  एक राजा के घर पुनर्जन्म होकर विद मैमोरी दुबारा राम लक्ष्मण से मिली । अब आप स्टेज वाली रामलीला के राम लक्ष्मण रावण शूर्पनखा आदि से ज्यादा जानने की कोशिश नहीं करोगे । तो भला आपको कैसा पता होगा ? उपन्यास ( हा हा हा ) का अगला भाग भी पढो भाई । बहुत पहले प्रकाशित हो चुका है ।
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