24 अप्रैल 2011

वो छिपकली जब इंसान थी ?

सत श्री अकाल सर जी ! मेरा नाम हरकीरत सिंह है । मेरा पेट नेम हैप्पी है । मैं हरनीत का छोटा भाई हूँ । मेरी उमर 21 साल है । मैं पटिआला में खालसा कालेज में पढता हूँ । आज हम सबको हरनीत ने आपका लिखा हुआ गुरबाणी पर लेख दिखाया । वो आजकल पटिआला आयी हुई है । हम सबको बहुत खुशी हुई । मैं रोज शाम को टयूशन जाते वक्त गुरुद्वारा जाता हूँ । अगर..??? मुझे भी गुरुबाणी के बारे में कुछ पूछ्ना हुआ । तो मैं भी आपको ई-मेल करुँगा ।

*** हरकीरत सिंह जी आपका सत्यकीखोज पर बहुत बहुत स्वागत है । आप..अगर मगर..नहीं बल्कि अवश्य ही टाइम निकालकर थोङा सतसंग भी किया करें । इससे आप भी Happy होंगे । और हम सब Very Happy होंगे । और सबको Happy करना बेहद पुण्य का काम है । अतः हमें आपके पत्रों का इंतजार रहेगा ।

*** आज वास्तव में मेरा सन्तवाणी पर ही कुछ काम करने का विचार था । पर वह कहते हैं ना । तेरे मन कुछ और है । दाता के कुछ और ।
..जैसे ही मैं विद टी लेपटाप के सामने बैठा । मेरी निगाह दीवाल में लगे बङे मिरर पर गयी । उसमें दिखाई देते दृश्य को देखकर सुबह ही सुबह मेरा मन दृवित हो गया । विचलित हो गया । शायद कोई आम इंसान इस दृश्य को देखता । तो कोई नोटिस न लेता । पर मैं ऐसी घटनाओं के पीछे छिपी हकीकत को जानता हूँ । इसलिये मुझे बङा कष्ट सा महसूस हुआ ।
ये वो छिपकली नहीं है 


आइने के अन्दर..दूसरी दीवाल पर लगे सींखचे के सहारे एक छिपकली बारबार दीवाल पर चङने की असफ़ल कोशिश कर रही थी । लेकिन चङ नहीं पा रही थी । इसका कारण था । उस छिपकली की कमर और नीचे के दोनों पैर किसी दरवाजे से भिंचकर टूट चुके थे । और एकदम चपटे से हो गये थे ।..सोचिये दीवार पर रहने वाली छिपकली की दो पैरों बिना क्या स्थिति हुयी होगी ?
हालांकि इस छिपकली को कम से कम मेरे घर में किसी ने जानबूझकर ऐसा नहीं किया होगा । ये छिपकली किसी कीट मच्छर आदि की ताक में किसी खिङकी या दरवाजे की ऐसी जगह होगी कि किसी के द्वारा उसको बन्द करते समय यह दब गयी होगी । और आजीवन के लिये अपंग हो गयी । दूसरों का काल बनने जा रही छिपकली खुद काल का शिकार हो गयी । यही जीवन का फ़लसफ़ा है ।
जरा सोचिये । ये भला कोई गौर करने लायक बात है ? ऐसा जाने क्या क्या और कहाँ कहाँ होता रहता है ? पर क्या आप भी ऐसा ही सोचते हैं ? तो ठहरिये । आप बहुत गलत सोचते हैं ।

विचार करके देखें । यही { दुर } घटना किसी इंसान के साथ हुयी होती । तो कितनी हाय हूय करता । दर्द से महीनों चिल्लाता । तुरन्त डाक्टर । एक्सरा । स्कैनिंग । दवाई । सवाई । गाङियों पर हस्पताल भागना । यार रिश्तेदार आदि का चिंतित होना । पता नहीं क्या क्या होता ।
लेकिन छिपकली के साथ..?
उसको कोई दवा दारू की पूछने वाला तो दूर । पानी पत्ता । खाना वाना भी कैसे मिला होगा ? सहज ही अन्दाजा लगाया जा सकता है । एक इंसान जैसा ही दर्द उसे भी हुआ होगा । उसकी हालत घिसटने लायक कितने दिनों में हुयी होगी आदि आदि । इसी दर्द और परेशानी का अन्दाजा लगाकर आप 84 के असंख्य कष्टों की सहज कल्पना कर सकते हैं ।

खैर..मैं इस छिपकली की कोई मदद करना भी चाहता । तो नहीं कर सकता था । क्योंकि वो मेरे देखने के समय फ़ुल्ली डैमेज हो चुकी थी । और मेरे ख्याल से उसमें सुधार की कोई गुंजाइश बाकी नहीं थी ।
कुछ देर विचलित होने के बाद मैं इसका आध्यात्म पहलू सोचने लगा । जिसके लिये मुझे कोई मशक्कत नहीं करनी थी ।
84 लाख योनियाँ क्योंकि भोग योनियों में आती है । इसलिये इस छिपकली द्वारा इस जन्म में और अन्य 84  जिसको वह स्टेप बाय स्टेप कन्टीनुअस भोगती आ रही है । ऐसा कोई कार्य नहीं हुआ होगा । जिसके लिये ये दन्ड मिला था । ये उसके लाखों साल पहले किसी मनुष्य जन्म के कर्म का ही फ़ल था । जिसमें बस उसकी गलती इतनी ही थी कि उसके द्वारा असावधानी से कोई जीव दुर्घटना का शिकार हुआ होगा । या जानी बूझी लापरवाही से हुआ होगा ।
मेरी इस बात पर यहाँ आपका एकदम उचित तर्क हो सकता है कि वह इंसान जिसके द्वारा अनजाने में छिपकली भिची । उस पर भी तो यही बात लागू होती है । मान लो छिपकली निर्दोष हो । ये तर्क भी सही लगता है ।
लेकिन अगर हम इस बात को मान लें । तो एक महाप्रश्न पैदा हो जाता है कि उस निरीह जीव को फ़िर किस बात का दन्ड मिला ? वो भी असहाय स्थिति में । जबकि भोग योनियों में सिर्फ़ भोग ही आते हैं ।

इसके विवेचन के लिये गीता में कहा गया है । गुण ही गुणों में बरत रहे हैं । यानी सरलता से कहा जाय । तो ये मिक्स टायप मामला है । आपके अच्छे बुरे कर्मों द्वारा जो ढेरों संस्कार बनते हैं । उनका एक निचोङ सा निकालकर सजा { भोग } तय होती है । उसमें आपके अच्छे कर्म बुरे कर्मों का प्रभाव कम या नष्ट भी कर देते हैं । तो इस इंसान द्वारा उसे दन्ड देकर बदला तो लिया ही गया । साथ ही नया संस्कार भी बना । ये दोनों ही बातें हैं । गुणों की फ़िलासफ़ी समझना बेहद जटिल है । लेकिन सिर्फ़ इसी के द्वारा कर्म संस्कार का गणित समझा जा सकता है ।
परन्तु ये बात किसी भी उच्चस्तर के भक्त या आत्मग्यान दीक्षा वाले पर लागू नहीं होती । उसके द्वारा इस तरह का नया कर्म अनजाने में भी नहीं होगा । ये बात पक्की है । तभी उसका मोक्ष हो पाता है ।
अब आईये । इससे मिलते जुलते कुछ और प्रसंगो पर चर्चा करें ।
पिछली गर्मियों की ही बात है । जब मैं शाम चार बजे के लगभग कंज के पेङ की छाया में अक्सर बैठता था । मुझे एक गिलहरी के बच्चे की करुण चींची दो तीन दिन से सुनाई दे रही थी । फ़िर मैंने एक बच्चे को वो गिलहरी का बच्चा जेब में लिये भी घूमते देखा । मुझे बारबार वो बच्चा आकर्षित कर रहा था । पर उसकी हिस्ट्री पता नहीं चल रही थी ।
तभी अगली सुबह जब मैं उसी स्थान पर था । एक बङा लङका मेरे पास आया । और बोला । ये गिलहरिया का बच्चा तीन दिन से भूखा चींचीं कर रहा है । समझ में नहीं आता । इसके लिये क्या करूँ । इसे क्या खिलाऊँ । और कैसे खिलाऊँ ? तीन दिन पहले इसकी माँ किसी प्रकार मर गयी । और तब से यह अपने घोंसले { जो बिना प्लास्टर की दीवाल पर ईंटों के बङे होल में था } में ऐसे ही चिल्ला रहा है । यहाँ कोई कौआ आदि इसको मार डालेगा ।
मुझे एकदम झटका सा लगा । इसीलिये मैं बारबार आता था । पर अभी उस बच्चे का सही समय न आने से कनेक्शन नहीं जुङ पा रहा था । मैंने कहा । रुई या किसी सूती कपङे की बारीक से बत्ती बनाकर पानी मिला दूध बत्ती से पिलाओ । वह बहुत खुश हुआ । उसने ऐसा ही किया । और फ़िर मेरे सुझाव अनुसार गुदगुदे कपङों की एक डलिया में बच्चे को घर के अन्दर ले जाकर रख दिया । मैंने सोचा । बच्चा एक महीने में आत्मनिर्भर हो जायेगा । पर उसकी जरूरत ही नहीं आयी । कहते हैं न । जिसका कोई नहीं उसका खुदा होता है यारो । एक गिलहरी को पता नहीं उस पर दया आ गयी । या प्रभु की लीला । वो बच्चे को उठाकर अपने घोंसले में ले गयी । और हम सबकी चिंता दूर हो गयी ।

*** लेख अधिक विस्तार ले रहा है । इसलिये .. अगला राइट पैर कटी गाय का प्रसंग । महाभारत युद्ध में ठीक रणक्षेत्र में । टिटहरी चिङिया के बच्चे कैसे बचे ..ये घटना । मेरे द्वारा पाले गये जानवर खरगोश हिरण
और अब तक तीन डाग के बारे में  । जिन्दगी में 13 वर्ष की आयु तक मेरे द्वारा नादानी में जानबूझ कर की गयी 3 हत्या । 2 मेंढक और 1  गिलहरी । और उनका फ़ल जो इसी जन्म में मिला । क्योंकि अगले भोग जन्म होने ही नहीं हैं ..आदि आदि घटनाओं का मानव जीवन से क्या सम्बन्ध है । और इसके आध्यात्मिक पहलू क्या हैं ? हमारी मामूली सी गलती क्या परिणाम देती है । ऐसे विषयों पर अगले समय में टाइम मिलते ही चर्चा करूँगा ।

अन्त में आप सबका बहुत बहुत आभार धन्यवाद ।
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