21 अप्रैल 2011

इस पार देह है उस पार चैतन्‍य है

प्‍यारे ओशो, कल प्रथम बार मैंने शिविर में विपश्‍यना ध्‍यान किया । इतनी उड़ान अनुभव हुई । कृपया विपश्‍यना के बारे में प्रकाश डालें ।
- ईश्‍वर समर्पण । विपश्‍यना मनुष्‍य जाति के इतिहास का सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण ध्‍यान प्रयोग है । जितने व्‍यक्‍ति विपश्यना से बुद्धत्‍व को उपलब्‍ध हुए । उतने किसी और विधि से कभी नहीं । विपश्यना अपूर्व है । विपश्यना शब्‍द का अर्थ होता है - देखना । लौटकर देखना ।
बुद्ध कहते थे - इहि पस्‍सिको । आओ और देखो । बुद्ध किसी धारणा का आग्रह नहीं रखते । बुद्ध के मार्ग पर चलने के लिए ईश्‍वर को मानना न मानना । आत्‍मा को मानना न मानना आवश्‍यक नहीं है । बुद्ध का धर्म अकेला धर्म है दुनिया में । जिसमें मान्‍यता, पूर्वाग्रह, विश्‍वास इत्‍यादि की कोई आवश्‍यकता नहीं है । बुद्ध का धर्म अकेला वैज्ञानिक धर्म है ।
बुद्ध कहते - आओ और देख लो । मानने की जरूरत नहीं है । देखो, फिर मान लेना । और जिसने देख लिया । उसे मानना थोड़े ही पड़ता है । मान ही लेना पड़ता है । और बुद्ध के देखने की जो प्रकिया थी । दिखाने की जो प्रकिया थी । उसका नाम था - विपस्सना ।
विपस्सना बड़ा सीधा सरल प्रयोग है । अपनी आती जाती स्वांस के प्रति साक्षी भाव । स्वांस जीवन है । स्वांस से तुम्‍हारी आत्‍मा और तुम्‍हारी देह जुड़ी है । स्वांस सेतु है । इस पार देह है । उस पार चैतन्‍य है । मध्‍य में स्वांस है । यदि तुम स्वांस को ठीक से देखते रहो । तो अनिवार्य रूपेण अपरिहार्य रूप से शरीर से तुम भिन्‍न अपने को जानोगे । स्वांस को देखने के लिए जरूरी हो जायेगा कि तुम अपनी आत्‍म चेतना में स्‍थिर हो जाओ । बुद्ध कहते नहीं कि - आत्‍मा को मानो । लेकिन स्वांस को देखने का ओर कोई उपाय नहीं है । जो स्वांस को देखेगा । वह स्वांस से भिन्‍न हो गया । और जो स्वांस से भिन्‍न हो गया । वह शरीर से भी भिन्‍न हो गया । क्‍योंकि शरीर सबसे दूर है । उसके बाद स्वांस है । उसके बाद तुम हो । अगर तुमने स्वांस को देखा । तो स्वांस के देखने में शरीर से तो तुम अनिवार्य रूपेण छूट गए । शरीर से छूटो । स्वांस से छूटो । तो शाश्‍वत का दर्शन होता है । उस दर्शन में ही उड़ान है । ऊँचाई है । उसकी ही गहराई है । बाकी न तो कोई ऊँचाईयां है जगत में । न कोई गहराईयां है जगत में । बाकी तो व्‍यर्थ की आपाधापी है ।
फिर स्वांस अनेक अर्थों में महत्‍वपूर्ण है । यह तो तुमने देखा होगा । क्रोध में स्वांस 1 ढंग से चलती है । करूणा में दूसरे ढंग से चलती है । दौड़ने में वह दूसरे ढंग से चलती है । आहिस्‍ता चलने में वह दूसरे ढंग से चलती है । चित ज्‍वर ग्रस्‍त होता है । 1 ढंग ये चलती है । तनाव से भरा होता है । तो 1 ढंग से चलती है । और चित शांत होता है । मौन होता है । तो दूसरे ढंग से चलती है ।
स्वांस भावों से जुड़ी है । भाव को बदलो । स्वांस बदल जाती है । स्वांस को बदल लो । भाव बदल जाते हैं । जरा कोशिश करना । क्रोध आये अगर । स्वांस को डोलने मत देना । स्वांस को थिर रखना । शांत रखना । स्वांस का संगीत अखंड रखना । स्वांस का छंद न टूटे । फिर तुम क्रोध न कर पाओगे । तुम बड़ी मुश्‍किल में पड़ जाओगे । क्रोध उठेगा भी । तो गिर गिर जायेगा । क्रोध के होने के लिए स्वांस को आंदोलित होना । स्वांस आंदोलित हो । तो भीतर को केंद्र डगमगाता है । नहीं तो क्रोध देह पर ही रहेगा । देह पर आये क्रोध का कुछ अर्थ नहीं । जब तक कि चेतना उससे आंदोलित हो । चेतना आंदोलित हो । तो जुड़ गये । फिर इससे उल्‍टा भी सच है । भावों को बदलो । स्वांस बदल जाती है । तुम कभी बैठे हो सुबह उगते सूरज को देखने नदी तट पर । भाव शांत है । कोई तरंग नहीं है चित पर । उगते सूरज के साथ तुम लवलीन हो । लौटकर देखना । स्वांस का क्‍या हुआ ? स्वांस बड़ी शांत हो गई । स्वांस में 1 रस हो गया । 1 स्‍वाद । 1 छंद बंध गया । स्वांस संगीत पूर्ण हो गयी ।
विपस्सना का अर्थ है शांत बैठकर । स्वांस को बिना बदले । ख्‍याल रखना । प्राणयाम और विपस्सना में यही भेद है । प्राणायाम में स्वांस को बदलने की चेष्‍टा की जाती है । विपस्सना में स्वांस जैसी है । वैसी ही देखने की आकांशा है । जैसी है । उबड़ खाबड़ है । अच्छी बुरी है । तेज है । शांत है । दौड़ती है । भागती है । ठहरती है । जैसी है ।
बुद्ध कहते हैं - तुम अगर चेष्‍टा करके स्वांस को किसी तरह नियोजित करोगे । तो चेष्‍टा से कभी भी महत फल नहीं होता । चेष्‍टा तुम्‍हारी है । तुम ही छोटे हो । तुम्‍हारे हाथ छोटे है । तुम्‍हारे हाथ की जहां जहां छाप होगी । वहां वहां छोटापन होगा ।
इसलिए बुद्ध ने यह नहीं कहा है कि - स्वांस को तुम बदलो । बुद्ध ने प्राणायाम का समर्थन नहीं किया । बुद्ध ने तो कहा - तुम तो बैठ जाओ । स्वांस तो चल ही रही है । जैसी चल रही है । बस बैठकर देखते रहो । जैसे राह के किनारे बैठकर देखते रहो । जैसे राह के किनारे बैठकर कोई राह चलते यात्रियों को देखे कि नदी तट पर बैठकर नदी की बहती धार को देखे । तुम क्‍या करोगे ?
आई 1 बड़ी तरंग । तो देखोगे । और नहीं आई तरंग । तो देखोगे । राह पर निकली कारें बसें । तो देखोगे । गाय भैंस निकली । तो देखोगे । जो भी है । जैसा है । उसको वैसा ही देखते रहो । जरा भी उसे बदलने की आकांक्षा आरोपित मत करना । शांत बैठकर स्वांस को देखते रहो । देखते रहो । स्वांस और शांत हो जाती है । क्‍योंकि देखने में ही शांति है ।  और निर्चुनाव - बिना चुने देखने में बड़ी शांति है । अपने करने का कोई प्रश्‍न ही नहीं है । जैसा है । ठीक है । जैसा है । शुभ है । जो भी गुजर रहा है आँख के सामने से । हमारा उससे कुछ लेना देना नहीं है । तो उद्विग्‍न होने का कोई सवाल ही नहीं है । आसक्‍त होने की कोई बात नहीं । जो भी विचार गुजर रहे है । निष्‍पक्ष देख रहे है । स्वांस की तरंग धीरे धीरे शांत होने लगेगी । स्वांस भीतर आती है । अनुभव करो फेफड़ों का फैलना । फिर क्षण भर सब रूक जाना । अनुभव करो । उस रुके हुए क्षण को । फिर स्वांस बाहर चली । फेफड़े सुकड़े लगे । अनुभव करो । उस सुड़कने को । फिर नासापुटों से स्वांस बाहर गयी । अनुभव करो । उतप्‍त स्वांस नासापुटों से बाहर जाती है । फिर क्षण भर सब ठहर जाता है । फिर नया स्‍वास आयी ।
यह पड़ाव है । स्वांस का भीतर आना क्षण भर । स्वांस का भीतर ठहरना । फिर स्वांस का बाहर जाना क्षण भर । फिर स्वांस का बाहर ठहरना । फिर नई स्वांस का आवागमन । यह वर्तुल है । वर्तुल को चुपचाप देखते रहो । करने को कोई भी बात नहीं । बस देखो । यहीं विपस्‍सना का अर्थ है ।
क्‍या होगा इस देखने से ? इस देखने से अपूर्व होता है । इसके देखते देखते ही चित के सारे रोग तिरोहित हो जाते है । इसके देखते देखते ही - मैं देह नहीं हूँ । इसकी प्रत्‍यक्ष प्रतीति हो जाती है । इसके देखते देखते ही - मैं मन नहीं हूं । इसका स्‍पष्‍ट अनुभव हो जाता है । और अंतिम अनुभव होता है कि - मैं स्वांस भी नहीं हूं । फिर मैं कौन हूं ? फिर उसका कोई उत्‍तर तुम दे न पाओगे । जान तो लोगे । मगर गूंगे को गुड़ हो जायेगा । वही है उड़ान । पहचान तो लोगे कि - मैं कौन हूं ? मगर अब बोल न पाओगे । अब अबोल हो जायेगा । अब मौन हो जाओगे । गुन सुनाओगे भीतर ही भीतर । मीठा  मीठा स्‍वाद लोगे । नाचोगे मस्‍त होकर । बांसुरी बजाओगे । पर कह नहीं पाओगे ।
ईश्‍वर समर्पण । ठीक ही हुआ । कहा तुमने । इतनी उड़ान अनुभव हुई । अब विपस्‍सना के सूत्र को पकड़ लो । अब इसी सूत्र के सहारे चल पड़ो । और विपस्‍सना की सुविधा यह है कि कहीं भी कर सकते हो । किसी को कानों कान खबर भी नहीं होगी । बस में बैठे । ट्रेन में सफर करते । कार में यात्रा करते । राह के किनारे । दुकान पर । बाजार में । घर में । बिस्‍तर पर लेटे । लिखते पढ़ते । खाते नहाते । किसी को पता भी न चले । क्‍योंकि न तो कोई मंत्र का उच्‍चरण करना है । न कोई शरीर का विशेष आसन चुनना है । धीरे धीरे इतनी सुगम और सरल बात है । और इतनी भीतर की है कि कहीं भी कर ले सकते हो । और जितनी ज्‍यादा विपस्‍सना तुम्‍हारे जीवन में फैलती जायेगी । उतने ही 1 दिन बुद्ध के इस अदभुत आमंत्रण को समझोगे - इहि पस्‍सिको । आओ और देख लो । बुद्ध कहते है - ईश्‍वर को मानना मत । क्‍योंकि शास्‍त्र कहते है - मानना तभी । जब देख लो । बुद्ध कहते है । इसलिए भी मत मानना कि मैं कहता हूं । मान लो । तो चूक जाओगे । देखना । दर्शन करना । और दर्शन ही मुक्‍तिदायी हे । मान्‍यताएं हिंदू बना देती है । मुसलमान बना देती है । ईसाई बना देती है । जैन बना देती है । बौद्ध बना देती है । दर्शन तुम्‍हें परमात्‍मा के साथ 1 कर देता है । फिर तुम न हिंदू हो । न मुसलमान । न ईसाई । न जैन । न बौद्ध । फिर तुम परमात्मा मय हो । ओर वही अनुभव पाना है । वहीं अनुभव पाने योग्‍य है । ओशो
http://www.osho.com/meditate/meditation-tool-kit/questions-about-meditation/what-is-vipassana

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