18 अप्रैल 2011

आपको बाबूजी बनना है ? या फ़टीचर जी बनना है ?

राजीव जी ! नमस्ते.. मैं सुभाष राजपुरा से ।
राजीव जी ! आपसे बिनती है कि पहले की तरह आप फ़िर 1 बार और मेरे प्रश्नों पर गौर करते हुए इनका बिल्कुल सही जवाब दें । जो मैं लिखने जा रहा हूँ । आप उसका बुरा मत मानना ( कही आप सोचे कि ये आदमी बारबार 1 ही बात को घसीटता रहता है ) आपको पता ही है कि मेरे 1 दूर के अंकल को ओशो का भूत सवार है ।


लेकिन मुझे ये बात समझ में नहीं आयी कि पुराने वाले रजनीश ओशो तो लोगो को अमर करने में लगे हुए थे । उनकी पुरानी कैसेट मैंने देखी थी । और किताब भी पढी थी ।
उनके अनुसार जीवन अनन्त है । जीवन कभी भी समाप्त नही होता । सिर्फ़ उसका रुपान्तरण हो जाता है । आत्मा सदा अमर है । केवल चोला बदल लेती है । उनके अनुसार हमारे अन्दर । यानी इस स्थूल शरीर के भीतर । जो जीवित है । उसे ही जीवात्मा कहा जाता है । हर कोई अपने अपने कर्मों के अनुसार नया जनम पाता है । इसको ही जीवन का रूपान्तरण कहा गया है । राजीव जी ! क्या बडे ओशो की ये बात बिल्कुल सही है ?

उनके अनुसार मौत का जीवन से कोई वास्ता नहीं ( यहाँ उनका इशारा आत्मिक जीवन की तरफ़ है ) उनके अनुसार शरीर का बनना और बिगडना 1 तरह से प्राकृतिक कार्य है । जिसको सामान्य तौर पर जन्म मरण बोल दिया जाता है । उनके अनुसार सुक्ष्म शरीर । और फ़िर उसके उपर स्थूल शरीर । ये सब परतों की तरह आत्मा के उपर वस्त्र चङे हु्ये हैं । उनके अनुसार केवल आत्मा ही मूलतत्व है । जो सदा से है । और सदा ही रहेगा ( ये आदि अन्तरहित है )  उनके अनुसार असल में हमारा असली स्वरुप आत्मा ही है । हम ही वो आत्मा हैं । और अपने आपको हम सब भूले हुए हैं । हमें होश ही नहीं है । एक तरह से मूर्छा में हैं । बडे ओशो अपनी बातों में गीता में कहे गये कृष्ण जी के बोलों की उदाहरण हमेशा देते हैं ।


अब आईय़े । नये.....? पर ( ओशो....? जी ) ये कृष्ण जी और गीता की बात नहीं करते । लेकिन अपने सिर्फ़ 20 मिनट के सतसंग में 10 या 12 सन्तों का नाम ले देते हैं ( पलटू जी । नामदेव । रविदास । धर्मदास । जगजीवन जी । कबीर जी । पीपा जी । मीरा जी का भी बहुत बार नाम लिया जाता है ) इनका प्रोग्राम वैसे तो मैं कम ही देखता हूँ । लेकिन जब मेरे वो वाले अंकल दिल्ली से हम लोगों के पास राजपुरा आये होते हैं । तो मुझे भी नये वाले ओशो का प्रोग्राम टीवी पर रोज 20 मिनट देखना पडता है ।

पुराने वाले ओशो जी की बात तो मैंने आपको बता दी । लेकिन ये नये वाले .... ? जी सिर्फ़ मरने को बोलते है । बस मीरा की तरह हो जाओ । मरने से पहले.. मर जाओ ?

जैसे आमतौर पर होता है । आम सतसंगों में इस संसार की अच्छी तरह बुराई करने के बाद । फ़िर नये ओशो जी कहते है - तुम तो मर जाओगे । तुम्हारे अन्दर से आत्मा रूपी पन्छी उड जायेगा । तुम सिवाय देखने के कुछ नहीं कर पाओगे ? और ये कहकर वो बडी मगनता से सिर हिलाते रहते हैं ।  जैसे पास में कोई म्यूजिक लगा हो ।
राजीव जी ! अगर मैं ये पूछूँ कि अगर मैं तो मर जाऊँगा । तो फ़िर ठीक है । मरने से पहले जितनी ऐश हो सकती है । कर लेता हूँ । दूसरी बात जब मैं मर गया । तो आसमान में उङती जा रही आत्मा रूपी पन्छी को देखेगा  कौन ? मेरी लाश ? कभी कभी तो लगता है कि ये नये ओशो जी भी बाकी सन्तों ( शायद नकली ) की तरह समझाते कम हैं । और डराते ज्यादा हैं ।

लगता है । इनके अनुसार शरीर हम खुद हैं । और आत्मा कोई पराया तत्व है ?  प्लीज इस पर कुछ रोशनी डालिये । आखिरी बात । और अगर मैं ही आत्मा हूँ । और इस स्थूल शरीर को 1 साधन की तरह इस्तेमाल करते हुए अपने कर्मों का दुख सुख भोग रहा हूँ । तो बात समझ में भी आती है । क्योंकि अगर मुझे अपनी असलियत का पता होगा । इस महाप्रश्न ( मैं कौन हूँ ? ) का उत्तर पता होगा ( मैं असल में आत्मा हूँ ) तो मैं फ़िर किसी न किसी गुरु की तलाश में निकलूँगा । जिससे दीक्षा लेकर अपने असली मुकाम पर पहुँच सकूँ । लेकिन अगर ये ही नही पता होगा कि - मैं कौन हूँ ? और अधुरे बाबा ये कहते रहेंगे कि तुम मर जाओगे कभी भी मर जाओगे । तो फ़िर ये ही बात है । तो ठीक है । मरने से पहले ऐश कर लो । क्योंकि बाबाजी के अनुसार मरने के बाद कुछ रहेगा ही नही ।

*** सुभाष जी क्योंकि आप लम्बा पत्र लिखते हैं । अतः हो सके । तो निम्न अशुद्धियाँ दूर करने का प्रयास करें ।

*** 1 - आप सुभाश की बजाय सुभाष में ये वाला ष लिखने के लिये shift दबाकर s और फ़िर सादा h  दवायें ।
2 - हु की बजाय हूँ लिखने के लिये hoo इसके बाद ( स्पेस दबाने से पहले ही ) shift दबाये रखकर esc के ठीक नीचे वाली इस निशान की ~ की दबायें । इसके बाद shift छोङकर । फ़िर से shift दबाकर m दबा दें । हूँ लिख जायेगा ।
3 - मै.. मे आदि को.. मैं.. में या कहीं भी बिन्दी  ( ं  ) लगाने हेतु । शब्द लिखने के बाद । स्पेस की दवाने से पहले ही । shift दवाकर m दवा दें ।
4 - आप लोग पूर्ण विराम नहीं लगाते । कृपया इसकी आदत अवश्य डालें । मेरा बहुत समय खराब होता है । पूर्ण विराम ( । ) लगाने के लिये shift दबाये रखकर enter के ठीक ऊपर इस निशान ( \ ) वाली " की " को दबा दें ।

** अब आईये आपके प्रश्नों पर बात करते हैं ।

- उनके अनुसार जीवन अनन्त है । जीवन कभी भी समाप्त नही होता । सिर्फ़ उसका रुपान्तरण हो जाता है । आत्मा सदा अमर है । केवल चोला बदल लेती है । उनके अनुसार हमारे अन्दर । यानी इस स्थूल शरीर के भीतर । जो जीवित है । उसे ही जीवात्मा कहा जाता है । हर कोई अपने अपने कर्मों के अनुसार नया जनम पाता है । इसको ही जीवन का रूपान्तरण कहा गया है । राजीव जी ! क्या बडे ओशो की ये बात बिल्कुल सही है ?

*** मैंने अपने कई लेखों में कहा है कि कबीर । रजनीश । तुलसी । वाल्मीकि । वेद । पुराण । विभिन्न शास्त्र । वेदान्त दर्शन आदि में जो सन्तों की वाणियाँ हैं । उनका सही अर्थ निकालना आम आदमी के वश की बात नहीं है । वे आम आदमी की जिग्यासा इस तरफ़ मोङने हेतु लिखी अवश्य गयी हैं । पर उनकी असली चाबी सन्तों के पास ही है । इसीलिये प्रत्येक सन्तवाणी सन्तों की महिमा । सदगुरु की आवश्यकता । असली और सम्पूर्ण शिष्यत्व आदि पर बेहद जोर देते हैं ।
आपने ऊपर जो भी बातें लिखी हैं । वे अक्षरशः सत्य है । इसका उत्तर आगे के उत्तरों में और भी स्पष्ट हो जायेगा ।

- उनके अनुसार मौत का जीवन से कोई वास्ता नहीं ( यहाँ उनका इशारा आत्मिक जीवन की तरफ़ है ) उनके अनुसार शरीर का बनना और बिगडना 1 तरह से प्राकृतिक कार्य है । जिसको सामान्य तौर पर जन्म मरण बोल दिया जाता है । उनके अनुसार सुक्ष्म शरीर । और फ़िर उसके उपर स्थूल शरीर । ये सब परतों की तरह आत्मा के उपर वस्त्र चङे हु्ये है । उनके अनुसार केवल आत्मा ही मूलतत्व है । जो सदा से है । और सदा ही रहेगा ( ये आदि अन्तरहित है )  उनके अनुसार असल में हमारा असली स्वरुप आत्मा ही है । हम ही वो आत्मा हैं । और अपने आपको हम सब भूले हुए हैं । हमें होश ही नहीं है । एक तरह से मूर्छा में हैं । बडे ओशो अपनी बातों में गीता में कहे गये कृष्ण जी के बोलों की उदाहरण हमेशा देते हैं ।

*** मौत.. जो मरता है । उसे कतई नहीं लगता कि उसकी कोई मौत हुयी है । यह तो बाहर से देख रहे लोगों को लगता है कि ये मर गया । क्योंकि जीवात्मा उस वक्त यमदूतों द्वारा शरीर से बाहर खींच लिया जाता है । और इस तरह शरीर जो अब तक जीवित था । मर जाता है ।
लेकिन इससे पहले.. हर प्राणी के कर्म संस्कार के अनुसार लगभग आधा घन्टा उसे बेहद कष्टदायक स्थिति से गुजरना होता है । जब यमदूतों के हवाले होने से पहले..काल.. जीव को अपने जबङों में दबाकर उसे खाता है । या कहिये..गन्ना चूस स्टायल में उसका रस सा निचोङता है । इसी आधा घन्टा के लिये जीव को मूर्छा आ जाती है । इसके बाद वो अपने आपको यमदूतों के हाथ में पाता है । इसके बाद कर्मानुसार उसकी विभिन्न गति होती है ।
ये सामान्य अवस्था का नियम है । इसलिये उसे कतई नहीं महसूस होता कि वह मर गया है । बल्कि उसे अपने घर । घरवालों । यार दोस्त वगैरा सबकी याद होती है । यदि वो नरक में जाता है । तो भी पूरी सजा के दौरान उसे अपना जीवन और उसके कर्म याद आते रहते हैं । स्वर्ग में भी सब याद रहता है ।
लेकिन..जैसे ही वह मानव योनि के शरीर को पुनः प्राप्त होता है । योगमाया उसकी बुद्धि पर परदा डाल देती है । अन्य 84 लाख योनियों के लिये ये नियम नहीं हैं । क्योंकि वे सिर्फ़ भोग योनियाँ हैं ।
तो ओशो ने कहा अवश्य है । पर उसका मतलब ये नहीं निकाल लेना चाहिये कि जीवन हमेशा है । इसलिये मस्त हो जाओ । होण दे..मौजां ही मौजां..।
जब तुम इंसान रूप में इतने दुखी हो । तो 84 लाख योनियों में तो भयानक कष्ट ही कष्ट हैं । मान लीजिये । कोई आपकी.. ओशो को कही इतनी बात ही पढे । तो वो तो निश्चिन्त हो ही जायेगा । पर यहाँ ओशो ने किसी स्थिति को समझाया है । बाकी अन्य स्थितियों पर उनके कष्ट दुख आदि के बारे में भी उन्होंने कहा है ।

- अब आईय़े । नये....? पर (  .....? जी ) ये कृष्ण जी और गीता की बात नहीं करते । लेकिन अपने सिर्फ़ 20 मिनट के सतसंग में 10 या 12 सन्तों का नाम ले देते हैं ( पलटू जी । नामदेव । रविदास । धर्मदास । जगजीवन जी । कबीर जी । पीपा जी । मीरा जी का भी बहुत बार नाम लिया जाता है )
ये सिर्फ़ मरने को बोलते है । बस मीरा की तरह हो जाओ । मरने से पहले.. मर जाओ ?
जैसे आमतौर पर होता है । आम सतसंगों में इस संसार की अच्छी तरह बुराई करने के बाद । फ़िर नये...? जी कहते है - तुम तो मर जाओगे । तुम्हारे अन्दर से आत्मा रूपी पन्छी उड जायेगा । तुम सिवाय देखने के कुछ नहीं कर पाओगे ? और ये कहकर वो बडी मगनता से सिर हिलाते रहते हैं ।  जैसे पास में कोई म्यूजिक लगा हो ।

*** रजनीश बेजोड़ हैं । और मात्र एक । केवल एक ।.. one and only ।
" ओशो कम्यून " में एक पत्थर पर ऐसा वाक्य लिखा हुआ है -
“ OSHO - never born..never died...only visited the planet earth between 11th Dec. 1931 to 19th Jan 1990 ”
यानी -
" ओशो- ना कभी पैदा हुआ । ना कभी मरा । केवल 11 दिसम्बर 1931 से 19 जनवरी 1990 के बीच पृथ्वी पर आया था । "
इसलिये भाई ! कहाँ से बारबार एक नया ओशो पकङ लाते हो ? बाजार में उनके डुप्लीकेट मिलने लगे क्या ? एक ओशो को तो दुनियाँ अभी तक झेल नहीं पायी ( मतलब अभी उनके ही गूढार्थ लोग नहीं समझ पा रहे । ) आप क्यों नकली माल से टेंशन पैदा कर रहे हो । जबकि असली खरा माल ( उनके उपदेश ) थोक में उपलब्ध है । चाइना के सस्ते माल की आदत सी मालूम होती है..आपको ।
उनसे कहना । भाई सबके बदले तुम मर जाओ । क्यों शाम को थके हारे इंसान को प्राइम टाइम 20 मिनटिया टेंशन देते हो । मीरा की तरह..? होने में पोटी निकल जाती है भाई । कैमरे के सामने । ठाठ बाट से टोपी लगाकर बैठना...मीरा की तरह होना नहीं है ।.. असली योग में प्राण की गति उल्टी चलती है । शरीर की सब चूलें हिल जाती हैं ।

- राजीव जी ! अगर मैं ये पूछूँ कि मैं तो मर जाऊँगा । तो फ़िर ठीक है । मरने से पहले जितनी ऐश हो सकती है । कर लेता हूँ । दूसरी बात.. जब मैं मर गया । तो आसमान में उङती जा रही आत्मा रूपी पन्छी को देखेगा..कौन ? मेरी लाश ? कभी कभी तो लगता है कि ये नये ओशो जी भी बाके सन्तों ( शायद नकली ) की तरह समझाते कम हैं । और डराते ज्यादा हैं । लगता है । इनके अनुसार शरीर हम खुद हैं । और आत्मा कोई पराया तत्व है ?  प्लीज इस पर कुछ रोशनी डालिये ।

*** भैया ! ऐश करना भी आपके हाथ की बात नहीं है । ( बिकाज.. अब वो अभिषेक बच्चन के पास है ).. ये भी आपने भाग्य कमाया हो । तभी तो मिलेगी । अपने पापा । चाचा । ताऊजी आदि से पूछना । वे भी नई उमर में आपकी ही तरह सोचते थे । और बाद में हर स्त्री पुरुष.. चूल्हा । चक्की । आटा । दाल में ही उलझकर रह जाता है । यहाँ कोई ऐश नहीं कर पाता ? ये ख्वामख्याली है आपकी ।.. अभी मम्मी पापा के ऊपर हो । तो चाहे इसको ऐश मान लो । और चाहो । तो ऐश्वर्या राय मान लो । मरजी आपकी । इसलिये ग्यानियों ने कहा है कि - बङी कठिन है..डगर पनघट की । जल्दी से भर लाओ ..यमुना से मटकी ।
मतलब ये जिन्दगी का सफ़र आसान नहीं है । इन्हीं परिस्थियों में आपको सभी कार्य करते हुये अपने उद्धार के लिये भी सोचना है । प्रयत्न करना है । अन्यथा..फ़िर पछताय होत का..जब चिङिया चुग गयी खेत । बाकी..ये उङते पन्छी वगैरा के चक्कर में आप मत पङो । ये बनाऊ बाबा लोगों के फ़न्डे हैं । वैसे ये बात आप सही कह रहे हो । ये ग्यान कम देते है । डराते ज्यादा हैं ।


- आखिरी बात । और अगर मैं ही आत्मा हूँ । और इस स्थूल शरीर को 1 साधन की तरह इस्तेमाल करते हुए अपने कर्मों का दुख सुख भोग रहा हूँ । तो बात समझ में भी आती है । क्योंकि अगर मुझे अपनी असलियत का पता होगा । इस महाप्रश्न ( मैं कौन हूँ ? ) का उत्तर पता होगा ( मैं असल में आत्मा हूँ ) तो मैं फ़िर किसी न किसी गुरु की तलाश में निकलूँगा । जिससे दीक्षा लेकर अपने असली मुकाम पर पहुँच सकूँ । लेकिन अगर ये ही नही पता होगा कि - मैं कौन हूँ ? और अधुरे बाबा ये कहते रहेंगे कि तुम मर जाओगे कभी भी मर जाओगे । तो फ़िर ये ही बात है । तो ठीक है । मरने से पहले ऐश कर लो । क्योंकि बाबाजी के अनुसार मरने के बाद कुछ रहेगा ही नही ।

‌*** भाई मेरे ! B.A के स्टूडेंट हो । ये बताओ कि गौतम बुद्ध जैसों का इतिहास ( एक जर्जर बूङे को देखना । अर्थी को देखना । अपाहिज या बीमार को देखना आदि ) किसलिये लिखा गया है ? ये तमाम शास्त्र किसलिये खोजियों ने लिखे हैं ?
आप इस इंटरनेट का यूज कर रहे हो । सभी तरह की आधुनिक टेक्नोलोजी का यूज कर सुख उठाते हो । ये सब क्या आसमान से टपकी हैं ? दूसरों की अथक मेहनत और खोज का ही तो परिणाम है । ये सब । और इन सबका भी ( कैसे विकास हुआ । क्या कठिनाईयाँ आयीं । आप ही लोगों ने कैसी हँसी बनायी आदि )
इतिहास लिखा हुआ मौजूद है कि नहीं । उसी से आगे के लोग फ़ायदा उठाते हैं । यही परम्परा है ।
 या किसी एक के लिये पूरा इतिहास नया लिखा जायेगा ?
जरूरी नहीं कि खुद को ठोकर लगे । तभी संभलना सीखा जाय । इसलिये..जिस तरह  सामाजिक नियम ये कहता है कि - अपने पैरों पर खङे होकर आत्मनिर्भर बनो । उसी तरह आध्यात्म का नियम यह कहता है कि - इसी दुर्लभ क्षणभंगुर मनुष्य जीवन में अपनी आगे की स्थिति संभाल सको । तो संभाल लो । और पुराने ऐतहासिक अनुभव यह कहते हैं कि - इसके लिये पहले स्वाध्याय करो । फ़िर किसी गुरु की तलाश करो । आप जब छोटे थे । तो मम्मी किताब से अ.. आ..पढातीं थीं । फ़िर स्कूल । फ़िर गुरु । फ़िर ..और स्कूल..। फ़िर और गुरु । इसके बाद डिप्लोमा..ट्रेनिंग आदि । इसके बाद बन गये बाबूजी ।
यही बात तो ..इंसानी जीवन में मौत के बाद लागू होती है कि -
आपको बाबूजी बनना है ? या फ़टीचर जी बनना है ?
तो सार ये कि हरेक आदमी इतना ग्यानी नहीं हो सकता कि उसे खुद ही सब बात का अहसास हो । हम जिन्दगी के सभी पक्षों में.. अधिकांश स्थितियों में..दूसरों के अनुभव से ही फ़ायदा उठाते हैं । किसी भी बात पर विचार करके देख लो । चाहे वह सवेरे की गरम गरम चाय की चुस्कियाँ ही सही ।
सोचिये ..कुछ लोगों की खोज और मेहनत से ही तो रोज सुबह आल वर्ल्ड में सब कह उठते हैं । 
आह ताज..वाह ताज..( मतलब ताजमहल चाय )
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