28 मार्च 2011

अपना होय तो दियो बतायी । कबीर साहब और धर्मदास

पागल बाबा खन्ना पंजाब में
सदगुरु कबीर साहब के शिष्य धनी धर्मदास जी का जन्म बहुत ही धनी वैश्य परिवार में हुआ था । बाद में कबीर साहब की शरण में आकर उनसे परमात्म ग्यान लेकर धर्मदास ने अपना जीवन सार्थक और परिपूर्ण किया । इस तरह उन्हें धर्मदास की जगह धनी धर्मदास कहा जाने लगा । धर्मदास वैष्णव थे । और ठाकुर पूजा किया करते थे । अपनी मूर्तिपूजा के इसी कृम में धर्मदास मथुरा आये । जहाँ उनकी भेंट कबीर साहब से हुयी । धर्मदास जी दयालु व्यवहारी और पवित्र जीवन जीने वाले इंसान थे । अत्यधिक धन संपत्ति के बाद भी अहंकार उन्हें छूआ तक नहीं था । वे अपने हाथों से स्वयँ भोजन बनाते थे । और पवित्रता के लिहाज से जलावन लकङी को इस्तेमाल करने से पहले धोया करते थे । एक बार इसी समय में जब वह मथुरा में भोजन तैयार कर रहे थे । उसी समय कबीर साहब से उनकी भेंट हुयी । उन्होंने देखा कि भोजन बनाने के लिये जो लकङियाँ चूल्हे में जल रही थीं । उसमें से ढेरों चीटिंयाँ निकलकर बाहर आ रही थी । धर्मदास ने जल्दी से शेष लकङियों को बाहर निकालकर चीटिंयों को जलने से बचाया । उन्हें वहुत दुख हुआ । वे अत्यन्त व्याकुल हो उठे । लकङियों में जलकर मर गयी चीटियों के प्रति उनके मन में बेहद पश्चाताप हुआ । वे सोचने लगे । आज मुझसे महापाप हुआ है । अपने इसी दुख की वजह से उन्होंने भोजन भी नहीं खाया । उन्होंने सोचा कि जिस भोजन के बनने में इतनी चीटियाँ जलकर मर गयी हों । उसे कैसे खा सकता हूँ । उनके हिसाब से वह दूषित भोजन खाने योग्य नहीं था । अतः वह भोजन उन्होंने किसी दीन हीन साधु महात्मा आदि को कराने का विचार किया । अतः वो भोजन लेकर बाहर आये । तो उन्होंने देखा । कबीर साहब एक घने शीतल वृक्ष की छाया में बैठे हुये थे ।
धर्मदास ने उनसे भोजन के लिये निवेदन किया ।
इस पर कबीर साहब ने कहा । हे सेठ धर्मदास ! जिस भोजन को बनाते समय हजारों चींटियाँ जलकर मर गयीं । उस भोजन को मुझे कराकर ये पाप तुम मेरे ऊपर क्यों लादना चाहते हो । तुम तो रोज ही ठाकुर जी की पूजा करते हो । फ़िर उन्हीं भगवान से क्यों नहीं पूछ लिया था कि इन लकङियों के अन्दर क्या है ?
धर्मदास को बेहद आश्चर्य हुआ कि इस साधु को ये सब बात कैसे पता चली । उस समय तो धनी धर्मदास के आश्चर्य का ठिकाना न रहा । जब कबीर साहब ने वे चीटिंया भोजन से जिंदा निकलते हुये दिखायीं । इस रहस्य को वे समझ न सके ।
उन्होने दुखी होकर कहा । हे बाबा ! यदि मैं भगवान से इस बारे में पूछ सकता । तो मुझसे इतना बङा पाप क्यों होता ।
धर्मदास को पाप के महाशोक में डूबा देखकर कबीर साहब ने अध्यात्म ग्यान के गूढ रहस्य बताये । जब धनी धर्मदास ने उनका परिचय पूछा । तो कबीर साहब ने अपना नाम सदगुरु कबीर साहब और निवासी अमरलोक ( सत्यलोक ) बताया । इसके कुछ देर बाद कबीर साहब अंतर्ध्यान हो गये ।
धर्मदास जी को जब कबीर साहब बहुत दिनों तक नहीं मिले । तो वो व्याकुल होकर जगह जगह उन्हें खोजते फ़िरे ।  और उनकी स्थिति पागल समान हो गयी । तब उनकी पत्नी ने सुझाव दिया ।
तुम ये क्या कर रहे हो ? उन्हें खोजना बहुत आसान है जैसे कि चींटी चींटा गुङ को खोजते हुये खुद ही आ जाते हैं ।
धर्मदास ने कहा - क्या मतलब ??
उनकी पत्नी ने कहा - खूब भन्डारे कराओ । दान दो । हजारों साधु अपने आप आयेंगे । जब वह साधु तुम्हें दिखे । तो उसे पहचान लेना ।

ये मनुष्य और सभी जीव इसी तरह कालपुरुष की कैद में हैं ।

धर्मदास को बात उचित लगी । और वे ऐसा ही करने लगे । उन्होंने अपनी सारी संपत्ति खर्च कर दी । पर वह साधु ( कबीर साहब ) नहीं मिला ।
बहुत समय भटकने के बाद उन्हें कबीर साहब काशी में मिले । परन्तु उस समय वे वैष्णव वेश में थे । फ़िर भी धर्मदास ने उन्हें पहचान लिया । और उनके चरणों में गिर पङे ।
और बोले - हे सदगुरु महाराज मुझ पर कृपा करें । और मुझे अपनी शरण में लें । हे गुरुदेव मुझ पर प्रसन्न हों । मैं उसी समय से आपको खोज रहा हूँ । आज आपके दर्शन हुये हैं ।
कबीर साहब बोले - हे धर्मदास तुम मुझे कहाँ खोज रहे थे । तुम तो चींटी चींटो को खोज रहे थे । सो वे तुम्हारे भन्डारे में आये । ( इस पर धर्मदास को अपनी मूर्खता पर बङा पश्चाताप हुआ..तब उसे प्रायश्चित भावना में देखकर कबीर साहब ने फ़िर कहा )
 लेकिन तुम बहुत भागयशाली हो । जो तुमने मुझे पहचान लिया । अब तुम धैर्य धारण करो । मैं तुम्हें जीवन के आवागमन से मुक्त कराने वाला मोक्ष ग्यान दूँगा ।
इसके बाद धर्मदास निवेदन करके कबीर साहब को अपने साथ बाँधोगढ ले आये ।
इसके बाद तो बाँधोगढ में कबीर साहब के श्रीमुख से आलौकिक आत्मग्यान सतसंग की अविरल धारा ही बहने लगी । दूर दूर से लोग सतसंग सुनने आने लगे । धर्मदास और उनकी पत्नी आमिन ने महामंत्र की दीक्षा ली । बाँधोगढ के नरेश भी कबीर साहब के सतसंग में आने लगे । और बाद में दीक्षा लेकर वे भी कबीर साहब के शिष्य बने ।
यहाँ कबीर साहब ने बहुत से उपदेश दिये । जिन्हें उनके शिष्यों ने बाँधोगढ नरेश और धनी धर्मदास के आदेश पर संकलित कर गृंथ का रूप दिया ।
विशेष -- जब भी किसी सच्चे सन्त का प्राकटय होता है तो कालपुरुष भयभीत हो जाता है कि अब ये जीवों को मोक्ष ग्यान देकर उनका उद्धार कर देगा । इससे हरसंभव बचाव के लिये वो अपने कालदूत वहाँ भेज देता है । धर्मदास का पुत्र नारायण दास जो कालदूत था । कबीर साहब का बहुत विरोध करता था । लेकिन उसकी एक भी नहीं चली । खुद कबीर साहब के पुत्र के रूप में कमाल कालदूत था । वह भी कबीर का बहुत विरोध करता था ।
बाद में..कबीर साहब ने धर्मदास को सुयोग्य शिष्य जानते हुये मोक्ष का अनमोल ग्यान दिया । और साथ ही ये ताकीद भी की ।
धर्मा तोहे लाख दुहाई । सार शब्द बाहिर नहीं जाई ।
इस पर धर्मदास ने कहा ।
सार शब्द बाहिर नहीं जाई । तो हँसा लोक को कैसे जाई ।
तब कबीर साहिब ने कहा - अपना होय तो दियो बतायी ।
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