25 फ़रवरी 2011

मेरी तरफ से तुम मुक्त हो

क्या यह संभव है कि मैं बगैर संन्यास लिए आपका शिष्य रह सकूं । और जिस मौन साधना का जन्म मेरे भीतर हुआ है । उसे आगे बढ़ाता जाऊं ? है तो सब आपका ही दिया हुआ । पर यह मेरे अंतस से जानी हुई प्रणाली है । और मुझे लगता है । इसी का अनुगमन करने में ज्यादा फायदा है । मैं यह भी सोचता हूं कि आपकी साधना में 1 शाखा ऐसी भी रहे । जिसमें बिना संन्यास वगैरह लिए भी उस सत्ता तक पहुंचा जाए । कृपाकर बताएं कि मैं कहाँ तक सही सोचता हूं ?
- जब तक तुम सोचते हो । गलत ही सोचोगे । सोचना मात्र गलत है । जब तक तुम ? सोचोगे । तब तक गलत सोचोगे । क्योंकि मैं की अवधारणा ही गलत है ।
तुम जोखम भी नहीं लेना चाहते । तुम पाने को भी आतुर हो । और तुम कोई खतरा नहीं उठाना चाहते । तुम कहते हो । क्या यह संभव है कि मैं बगैर संन्यास लिए आपका शिष्य रह सकूं ? मेरी तरफ से कोई
अड़चन नहीं है । अड़चनें तुम्हारी तरफ से आएंगी । मेरी तरफ से क्या अड़चन है । तुम मजे से शिष्य रहो । विद्यार्थी रहो । कोई भी न रहो । मेरी तरफ से कोई अड़चन नहीं है । मेरी तरफ से तुम मुक्त हो । अड़चन तुम्हारी तरफ से आएगी । तुम बिना संन्यासी हुए शिष्य रहना चाहते हो । अड़चन शुरू हो गयी । इसका मतलब यह हुआ कि मेरे बिना पास आए पास आना चाहते हो । कैसे यह होगा ? पास आओगे । तो संन्यास फलित होगा । संन्यास से बचना है । तो दूर दूर रहना होगा । थोड़े फासले पर बैठना होगा । थोड़ी गुंजाइश रखनी होगी । कहीं ज्यादा पास आ जाओ । और मेरे रंग में रंग जाओ । यह डर तो बना ही रहेगा न ? मेरी बात भी सुनोगे । तो भी दूर खड़े होकर सुनोगे कि कितनी लेनी । और कितनी नहीं लेनी । चुनाव करने वाले तुम ही रहोगे । और काश ! तुम्हें पता होता कि - सत्य क्या है ? तब तो मेरी बात भी सुनने की क्या जरूरत थी ? तुम्हे सत्य का कुछ पता नहीं । तुम चुनाव करोगे । तुम्हारे असत्य ही उस चुनाव में आधारभूत होंगे ।
वही तुम्हारी तराजू होगी । उसी पर तुम तौलोगे । और सदा तुम डरे भी रहोगे कि कहीं ज्यादा पास न आ जाऊं ।
कहीं इन और दूसरे गैरिक वस्त्रधारियों की तरह मैं भी सम्मोहित न हो जाऊं । मुझे तो संन्यासी नहीं होना है । मुझे तो सिर्फ शिष्य रहना है ।
शिष्य का मतलब समझते हो ?
शिष्य का मतलब होता है । जो सीखने के लिए परिपूर्ण रूप से तैयार है । परिपूर्ण रूप से तैयार है । फिर संन्यास घटे कि मौत घटे । फिर शर्त
नहीं बांधता । वह कहता है - जब सीखने ही चले । तो कोई शर्त न
बांधेगे । फिर जो हो । अगर सीखने के पहले ही निर्णय कर लिया है
कि इतना ही सीखेंगे । इससे आगे कदम न बढ़ा सके । तो तुम अपने अतीत से छुटकारा कैसे पाओगे ? तुम अपने व्यतीत से मुक्त कैसे होओगे ? तो तुम्हारा अतीत तुम्हे अवरुद्ध रखेगा । मेरी तरफ से कोई अड़चन
नहीं है । मैं किसी को भी नहीं कह रहा हूं कि तुम संन्यासी हो जाओ ।
जल्दी ही मैं लोगों को समझाने भी लगूंगा कि अब मत होना । क्योंकि आखिर मुझे भी कितनी झंझट लेनी है ।
उसकी सीमा है ।
जल्दी ही मैं लोगो को हताश भी करने लगूंगा कि नहीं । कोई जरूरत नहीं है संन्यास की । मैं किसी को कह भी नहीं रहा हूं कि तुम संन्यास ले लो । और अगर कभी किसी को कहता हूं । तो उसी को कहता हूं । जिसे मैं पाता हूं । जो कि ले ही चुका है । जो सिर्फ प्रतीक्षा कर रहा है । प्रतीक्षा भी इसलिए कर रहा है कि संकोच लगता है । कैसे कहूं कि मुझे संन्यास दे दें । उसको ही मैं कहता हूं । मांगूं कैसे ? पता नहीं । पात्र हूं । या अपात्र हूं ? ऐसा जब मैं कोई व्यक्ति पाता हूं । जो यह
सोचता है कि मांगूं कैसे । पता नहीं । अपात्र होऊं । यह दुविधा मेरे सामने नहीं खड़ी करना चाहता कि मुझे न कहना पड़े । तो चुपचाप
प्रतीक्षा करता है । जब मैं किसी को ऐसे चुपचाप प्रतीक्षा करते देखता हूं ? तभी उसे पुकार कर कहता हूं कि - तू संन्यास ले । अन्यथा मैं नहीं कहता ।
यह प्रश्न पूछा है - विजय ने । विजय परसों दर्शन को आया था । बारबार माला की तरफ देखता था । मगर मैंने नहीं कहा ।
नहीं कहा इसीलिए कि यह सब भाव भीतर बैठे हैं । और विजय मुझसे
परिचित है । कम से कम 20 साल से परिचित है । लेकिन उसके भीतर 1 तरह की अस्मिता है । जिसका मुझे पता है । कठोर
अस्मिता है । वही बाधा है । वही अस्मिता नए नए रूप लेती है । अब
वही अस्मिता कहती है कि - क्या आपके पास शिष्य बनकर नहीं रह सकता ? संन्यास लेना क्या आवश्यक है ? मेरी तरफ से कोई भी बात आवश्यक नहीं है । तुम्हें जितने देर तक चलना हो । चलो । शिष्य
रहना है । शिष्य रहो । विद्यार्थी रहना हो । विद्यार्थी रहो । दर्शक
की भांति आना है । दर्शक की भांति आओ । तुम जितना पी सको । उतना पिओ । मेरी तरफ से बाधा नहीं है कि अगर तुम आगे बढ़ना चाहो । तो मेरी तरफ से उसमें भी बाधा नहीं है । तुम पूछते हो कि - जिस मौन साधना का जन्म मेरे भीतर हुआ है । उसे आगे बढ़ाता जाऊं ? है तो सब आपका ही दिया हुआ । यह भी तुम बड़ी मुश्किल से कह रहे होओगे । यह भी मन मारकर कहा होगा कि - है तो सब आपका ही दिया हुआ । यह भी तुम्हें कहना पड़ा है । नहीं तो प्रसन्नता तुम्हारे
यही कहने में है कि मेरे भीतर जिस मौन साधना का जन्म हुआ है ।
उसे मैं आगे बढ़ाता जाऊं ? क्योंकि वह मेरे अंतस से जागी हुई प्रणाली है । और मुझे लगता है कि इसी का अनुगमन करने में ज्यादा फायदा है । जब तुम जानते ही हो । फायदा किस बात में है ? तो चुपचाप अपने फायदे की बात को माने चलो । जिस दिन फायदा न दिखे । उस दिन पूछना । अभी वक्त नही आया । अभी पूछने का क्षण नहीं आया । जिस दिन हार जाओ । उस दिन पूछना । पूछते क्यों हो । अगर फायदा पता है ? कहीं संदेह होगा । कहीं संदेह होगा कि फायदा हो रहा है कि नहीं हो रहा है ? कि मैं माने जा रहा हूं ? अक्सर ऐसा हो जाता है । 
1 वृद्ध सज्जन कुछ दिन पहले आए । कहा कि 30 साल से ध्यान कर रहा हूं । मंत्र जप करता हूं । मैंने पूछा - कुछ हुआ ? कहा - हुआ क्यों नहीं । मगर चेहरे पर मुझे दूसरा भाव दिखायी पड़ रहा है कि कुछ नहीं हुआ । वह कहते हैं - हुआ क्यों नहीं । तो मैंने कहा - सच कह रहे हैं । थोड़ा सोचकर कहें । आंख बंद कर लें । 1 क्षण सोच लें । कुछ हुआ ? सोचा होगा । एकदम मूढ़ नहीं थे । नहीं तो जिद बांधकर बैठ जाते कि जरूर हुआ है । आंख खोली । और कहा - आपने ठीक
पकड़ा । हुआ तो कुछ भी नहीं है । तो फिर मैंने कहा - आप इतनी जल्दी कह क्यों दिए कि हुआ क्यों नहीं । कहा - वह भी मुश्किल मालूम होता है । 30 साल से मंत्र जाप करो । और कुछ न हो ? तो कैसी अपात्रता मालूम होती है । तो कैसा पापी हूं मैं । फिर 30 साल बेकार गए ? तो 30 साल का अहंकार खंडित होता है । तो अक्सर लोग, जब कुछ भी नहीं होता । तो भी किए चले जाते हैं । क्योंकि अब कैसे छोड़े ? 30 साल नियोजित कर दिए । किसी ने 50 साल किसी विधि मे लगा दिए । अब कैसे छोड़े ?
अभी 1 वृद्ध सज्जन सी. एस. लेविश लंदन से आए । वह गुर्जिएफ के शिष्य । कोई 50 साल । 80 साल उनकी उस । 50 साल गुर्जिएफ की धारा के अनुसार चले । मुझे वहाँ से पत्र लिखते थे कि आना है । दर्शन करना है । गुर्जिएफ के साथ तो नहीं हो पाया । चूक गया । आपको नहीं चूकना है । यहाँ आए । लेकिन वह 50 साल का जो गुर्जिएफ की प्रणाली के साथ चलने का अहंकार है । वह भारी था । कहने लगे कि अब इस उम्र में क्या संन्यास लेना । 80 साल का हो गया । अब इस उम्र में क्या नाव बदलनी ? मैंने कहा - पुरानी नाव ले
जाती हो । तो मैं भी नहीं कहूंगा कि - नाव बदलो । मेरी नाव में वैसे
ही भीड़ है । तुम पुरानी नाव से जा सकते हो । इस नाव में वैसे भी गुंजाइश नहीं है । नाव को रोज बड़ा करने की कोशिश चल रही है । मगर अगर पुरानी नाव कहीं न ले जाती हो । तो 1 दफा सोच लो । वह इतने घबड़ा गए कि भाग गए । यह बात ही सोचकर घबड़ा गए
कि पुरानी नाव से न हुआ हो । फिर उन्होंने आश्रम में दूसरे दिन प्रवेश
ही नहीं किया । आए थे यहां 2-3  महीने रुकने को । सिर्फ 1 चिट्ठी लिखकर छोड़ गए कि मैं जाता हूं । वह 50 साल का भाव कि 50 साल मैंने 1 साधना में लगाए । आदमी का अहंकार न मालूम किस किस तरकीबों से अपने को भरता है ।
मार्ग मिला हो । मजे से चलो । लाभ हो रहा हो । छोड़ना ही मत । फिर क्या मेरे साथ और हानि उठानी है । जब लाभ हो रहा है । फायदा हो रहा है । और तुम्हें पता है कि फायदा किस बात में होगा । तुम
निश्चितमना उसी मार्ग पर चलते रहो । और मुझे यह भी सलाह दी है कि मैं यह भी सोचता हूं कि आपको साधना में 1 शाखा ऐसी भी रहे । जिसमें बिना संन्यास वगैरह लिए भी उस सत्ता तक पहुंचा जाए । क्यों ? जिनकी इतनी हिम्मत नहीं । जो मुझसे पूरे जुड़ सकें । वे कहीं और ही रहें । यहां भीड़ उनकी क्यों मचाना ? यहां मुझे उन पर काम करने दो । जिन्होंने साहस किया है - अपने को पूरा छोड़ने का । इन कमजोरों को यहां क्यों इकट्ठा करना ? इन अपाहिजों को यहां क्यों इकट्ठा करना ? लगड़े लूलों को क्यों इकट्ठा करना ? जिन लोगों ने समर्पण किया है ।
उनको पहुंचा पाऊं । उनकी मंजिल तक । सारी शक्ति उन्हीं पर लगा देनी है । इसलिए चुनूंगा । जल्दी ही उनको चुनता रहूंगा ।
धीरे धीरे उनको छांट दूंगा बिलकुल । जिनसे मुझे लगे कि जिनका साथ कुछ अर्थ का नहीं । जो साथ हैं ही नहीं । जो नाहक ही भीड़भाड़ किए हैं । ताकि मेरी सारी शक्ति और मेरी सारी सुविधा उनके लिए उपलब्ध हो सके । जिन्होंने जोखम उठायी है । उनके प्रति मेरा कुछ दायित्व है ।
उनने जोखम उठायी है । उनके प्रति मेरा कुछ कर्तव्य है । और जिनने कुछ दाव पर नहीं लगाया है । उनसे मेरा क्या लेना देना ? तुम उतनी ही मात्रा में पाओगे । जितना तुम दाव पर लगाओगे । उससे ज्यादा नहीं मिल सकता है । उससे ज्यादा मिलना संभव ही नहीं है ।
आज कुछ नहीं दिया मुझे पूर्व ने । यों रोज कितना देता था ।
छंद छंद हवा के झोंके । प्रकाश गान गंध ।
आज उसने मुझे कुछ नहीं दिया । शायद मेरे भीतर नहीं उभरा ।
मेरा सूरज खोले नहीं मेरे कमल ने । अपने दल । रात बीत जाने पर ।
सूरज तभी दे सकता है । जब तुम अपने कमलदल खोलो । तुम जब अपना हृदय कमल खोलो । तुम अपना हृदय कमल बंद रखो । फिर शिकायत सूरज की मत करना । फिर यह मत कहना कि सूरज ने मुझे कुछ नहीं दिया । तुम लेने के लिए झोली तो फैलाओ । संन्यास वही झोली फैलाना है । तुम कहते हो - मेरी झोली खाली है ।
तुम कहते हो छुपाऊंगा नहीं । सच सच कहे देता हूं - मेरी झोली खाली । यह मेरे हाथ खाली । यह मेरा भिक्षापात्र है । मुझे भर दो । संन्यास का इतना अर्थ है कि मैं निवेदन करता हूं कि मैं खाली रह गया हूं । और मैं खाली नहीं रह जाना चाहता । मैं इस जीवन से भरकर विदा होना चाहता हूं । संन्यास का अर्थ है कि मैं कहता हूं कि मैं अज्ञानी हूं । मुझे किरण चाहिए । लोग हैं । जो कहना चाहते हैं कि - जानता तो मैं भी हूं । लेकिन थोड़ा बहुत आपसे भी मिल जाए । तो कोई हर्जा नहीं । उसको भी सम्हाल लूंगा । उसको भी रख लूंगा । ऐसे तो मैंने पा ही लिया है । कुछ आपसे भी मिल जाए । तो चलो और । थोड़े से ज्यादा भला । जिन्हें पता है । उन्हें मुझसे कुछ भी नहीं मिलेगा । जो ज्ञानी हैं । उन्हें मेरे पास से 1 किरण भी नहीं मिलेगी । इसलिए नहीं कि मैं उन्हें देने में कोई कंजूसी करूंगा । नहीं मिल सकती । क्योंकि वे अपने कमल हृदय को ही नहीं खोलेंगे ।
संन्यास निमंत्रण है अपने को मिटाने का ।
विराट किसी, तरल रूप सिंधु की लहर । आत्मा के मेरे तट तोड़ रही है । तकलीफ हो रही है मगर ।
आश्वासन मिल रहा है एक कि लहर रूप से अरूप को जोड़ रही है ।
पीड़ा तो होती है । जब तुम टूटोगे । तो दुख भी होगा । हृदय क्षार क्षार
होगा । खंड खंड होगा । टूटोगे । तो कोई सुख से कोई नहीं टूटता । यह बात सच है । टूटो तो पीड़ा होती ही है । लेकिन इतना ही आश्वासन बना रहे - तकलीफ हो रही है मगर । आश्वासन मिल रहा है एक कि लहर रूप से अरूप को जोड़ रही है ।
आने दो मुझे । 1 लहर की तरह । खोलो अपना हृदय । तो मैं तुम्हें तोडूं । तोडूं । तो तुम्हें बनाऊं । मारूं । तो तुम्हें जिलाऊं । सूली पर
लटको । तो तुम्हारा पुनरुज्जीवन है । संन्यास सूली है । और पुनरुज्जीवन । ओशो 20 जनवरी 1978 श्री रजनीश आश्रम पूना
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