12 फ़रवरी 2011

मेरे जीवन का लक्ष्य कुछ और ही है ??



1 - ZEAL । पोस्ट । क्या आपने भगवान को देखा है ? पर ।
राजीव जी । बहुत बार ईश्वर के प्रत्यक्ष दर्शन कर चुकी हूँ । सिर्फ कहती नहीं हूँ । किसी से । लोग यकीन नहीं करेंगे । अक्सर अपने बगल में बैठा पाती हूँ ईश्वर को ।
RAJEEV - दिव्या जी आपकी बात पर मैं सिर्फ़ हसूँगा । क्योंकि इस ब्लाग जगत में । और इस तमाम जगत में । ऐसे भी तमाम लोग हैं ।..जो हम आप जैसे आस्तिक लोगों को मानसिक रोगी कहते हैं । और डाक्टर को दिखाने की । इलाज कराने की सलाह देते हैं । पर आप तो स्वयँ ही डाक्टर हैं । और इंशाअल्लाह स्वस्थ भी हैं । मेरा मतलब । जहनी तौर पर । हा हा हा । तो आप किस डाक्टर को दिखायेंगी ??.. क्योंकि आपकी ये कमेंट साधारण बात नहीं कह रही । इसलिये मैंने इसे लेख में शामिल कर लिया । मेरे ब्लाग्स का पूरा मैटर ही यह कहता है कि ईश्वर के दर्शन सहज हो सकते हैं । पर आप में इसकी लगन हो । और आप सहज हों ??.. मम दर्शन फ़ल परम अनूपा । जीव पाय जब सहज ?? सरूपा ।.. शंकर सहज ?? सरूप संभारा । लागि समाधि अखंड अपारा ।
2 - नमस्कार राजीव जी । आपसे बात करके बहुत अच्छा लगा । जैसा कि मैंने कहा कि आपके नये ब्लाग्स पर नीचे कुछ कन्याओं की फ़ोटो आ रही हैं । ( शायद एडवर्टिजमेंट है । ) वो आपके ब्लाग्स के प्रति लोगों के आदर भाव को आहत करेंगी । ऐसा मेरा सोचना है । क्योंकि मेरी नजरों में तो बहुत इज्जत है । आपके सभी ब्लाग्स की । कुछ बुरा लगा । तो माफ़ कीजियेगा । आपसे और भी बात करनी थी । फ़ोन से । पर संकोचवश कह नहीं पाया । इसलिये मेल में लिख रहा हूँ ।
मैं यहाँ चंडीगढ में एक प्राइवेट जाब करता हूँ । मेरी फ़ैमिली में 6 मेम्बर है । जिनकी सारी जिम्मेबारी मेरे ऊपर ही है । मेरी उमर इस 6 अप्रेल को 30 पूरी हो जायेगी । और 31 वां साल शुरू हो जायेगा । लेकिन मैं अभी तक कुँवारा ही हूँ । और ना ही भविष्य में विवाह करने का कोई इरादा है मेरा । क्योंकि पता नहीं मेरा मन आजकल के लङकों की तरह इधर उधर नहीं भटकता । ना मैं किसी प्रकार का नशा करता हूँ । ना कोई शौक है । बस भूख है । तो एक ही चीज की कि खुद को जानना । उस परमात्मा को जानना ।
ऐसा मैं नहीं सोचता । बस मेरे अन्दर से आवाज आती है कि मैं सांसारिक भोग के लिये नहीं आया हूँ । कुछ अलग है ?? जो मुझे पूरा करना है । मेरे जीवन का लक्ष्य कुछ और ही है ?? जो मुझे नहीं पता ?? पर मुझे लगता है कि कुछ अलग है । अब वो क्या अलग है ?? वही जानना है मुझे ।

आपके सभी ब्लाग्स मैंने अच्छी तरह से अध्ययन किये हैं । और आखिर में मैं इसी निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ कि आपको मैं अपने मार्गदर्शक के रूप में देखता हूँ । जो मुझे सही मार्ग बताकर मेरा भला कर सकते हैं ।
क्योंकि मुझे आज तक कोई ऐसे सच्चे संत नहीं मिले । जिन्हे मैं अपना गुरु कह सकूँ ।
अब आप सोच रहे होंगे कि इतनी छोटी उमर में ये कैसे विचार हैं ? ( शायद मुझे पागल समझें । ) पर यकीन मानिये । ये मेरे शरीर में मौजूद आत्मा के विचार हैं । जो मुझे प्रेरित कराती है । सही दिशा में जाने के लिये ।
मेरे साथ कई बातें अजीव हुयीं हैं । जिनके होने का मतलब मुझे समझ नहीं आया कि मेरे साथ ही क्यों हुयी .....??? किसी अजीव सी शक्ति का आभास होता है । अपने आसपास । जो मुझे समय समय पर चेताती रहती है कि सही क्या है । और गलत क्या है । और कई प्रकार से मुझे संदेश दे देती है । ( पूरा विवरण मैं अपनी नेक्स्ट मेल में दे पाऊँगा । )
अभी आफ़िस में हूँ । और समय के अभाव के कारण सब लिख पाना मुश्किल है । इसलिये क्षमा कीजियेगा ।
धन्यवाद । ( एक नियमित पाठक । चन्डीगढ से । ई मेल से । )
RAJEEV - आपके विचार जानकर मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ । और न ही मैंने आपको पागल समझा । दरअसल ये दोनों प्रतिक्रियायें साधारण लोगों की हो सकती हैं ।.. हमारा तो मिलना जुलना ही ऐसे लोगों से होता है । जो शाश्वत सत्य की तलाश में हैं । आत्मा को जानना चाहते हैं । परमात्मा को जानना चाहते हैं । कई संत अपने बचपन की अवस्था से ही वैरागी थे । जिनमें विवेकानन्द जी । रामकृष्ण परमहँस । श्री स्वरूपानन्द जी । श्री अद्वैतानन्द जी । श्री शिवानन्द जी । आदि शंकराचार्य जी आदि बहुत से हैं ।.. सनक । सनन्दन । सनत । कुमार.. आदि तो बृह्म मन्डल के वैरागी रहे ।.. वास्तव मैं ये जीवन । नाटक के उस परदे की तरह है । जिसमें परदे के इस पार । स्टेज पर आते ही हम जीवन का रोल अदा करते हैं । और परदे के उस पार । पीछे जाते ही हमें किरदार का मेकअप आदि भारी और उबाऊ लगता है । तब उसे उतारकर हम निजत्व में सुख महसूस करते हैं । और आपको इस निजत्व का कुछ कुछ बोध होता है । वास्तव में सभी के जीवन का लक्ष्य खुद को जानना ही है । पर वे इस संसार रूपी चार दिन के मेले की चकाचौंध से चौंधिया कर भृमित हो गये हैं ।
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