19 जनवरी 2011

गुङ का गोबर कभी नहीं होता ??

बातें तो अच्छी कर लेते हैं ।...क्योंकि हो सकता है ?? आपने सभी गृन्थ और शास्त्र अच्छी तरह से पढ लिये हैं..जिनका इनडायरेक्टली इशारा आपकी इस बात की तरफ़ है कि आपको ग्यान प्राप्त हो गया है ।..लेकिन एन्ड में सब गुङ गोबर कर दिया..?..( पर आप लोग सिर्फ़ बातें करना जानते हैं । बङी बङी बातें । आओ मेरे पास । और सीखो । इस अमूल्य ग्यान को । इस अमूल्य परम्परा को । मैं मर गया । फ़िर आपको कौन बतायेगा ? और कौन सिखायेगा । ये सब ?? )..ग्यान है । तो लोग खुद ही खिंचे चले आयेंगे । आपको बुलाने की क्या जरूरत है ?...आपने पढ पढकर ग्यान तो ले लिया । मगर आपकी । मैं । अभी खत्म नहीं हुयी है ।..और जब तक वो है । तब तक सब ग्यान व्यर्थ है । किताबी है । अगर कुछ बुरा लगा हो । तो सारी । पर मुझे जो लगा । मैंने कहा । Harman । पोस्ट । पराये पुरुष से बच्चे पैदा करना नियोग या संभोग ? । पर ।
मेरी बात..मुझे ये कहावत ही बङी अटपटी सी लगती है । दरअसल गुङ जैसे श्रेष्ठ पदार्थ में कोई भी क्रिया क्यों न हो । वो गोबर कभी नहीं हो सकता ?..आपकी बात से मुझे एक साधु की बात याद हो आयी । जो उन दिनों सहज समाधि क्रिया सीखने के लिये मेरे पास रुका हुआ था । और बात इसी मैं पर चल रही थी । तो मैंने ( अब यहीं बताईये । मैंने या हमने के अलावा कौन सा शब्द यूज करूँ ? ) सतसंग वार्ता में इसी मैं रूपी अहम को पचासों जगह परमात्म प्राप्ति में बाधक बताया । और उसके उदाहरण भी दिये ।..इसके बाद सामान्य विषयों पर बात होने लगी । तब वह मुझसे घर परिवार आदि के वारे में पूछने लगे । तब मैंने ( हा हा हा ) बताया कि ये मेरा घर है । एक घर उस शहर में है । आश्रम वहाँ है आदि..। इस पर वह साधु रहस्यमय अन्दाज में मुस्करा उठे । और बोले । क्षमा करना । महाराज । सतसंग के समय पर आप मैं को त्यागने पर बेहद बल दे रहे थे । यहाँ हर बात में मैं ही मैं कर रहे हैं । साधु की कथनी और करनी में ये अंतर कैसा ?? इस बात पर मुझे नान स्टाप हँसी आयी ।..मैंने कहा । बाबाजी आप अपने से जुङी हुयी किसी बात को व्यक्त करिये । जैसे कि आप इस समय ऋषिकेष से आये हैं । तो किस तरह मुझे बतायेंगे । मैं ऋषिकेश से आया हूँ । या हम ऋषिकेष से आये हैं । यदि आप हम का प्रयोग करते हैं । तो हम और भी बहुवचन का बोधक है । यानी दो या फ़िर अनेकों मैं का बोध कराता है । मैं भले ही अहम का बोधक है । पर कोई भी इसके प्रयोग से बच नहीं सकता । हाँ किसी ग्यानी । किसी साधु संत का मैं कहते हुये अलग भाव होता है । और किसी संसारी का एकदम अलग । साधु जानता है । सिर्फ़ एक वही है । वही है । मैं का झूठा व्यवहार तो । झूठे संसार के लिये है । पर संसारी इसको सत्य मानते हुये मैं मैं कहता है । याद करें । श्रीकृष्ण पूरी गीता में । मैं राजा हूँ । वृक्षों में मैं पीपल हूँ । देवताओं में मैं इन्द्र हूँ । आदि कहकर..तुम सब त्यागकर मुझ एकमात्र परमात्मा की शरण में आ जाओ । ऐसा कहते हैं । और वैसे मैं को त्यागने को कहते हैं ।


अब..जैसा कि लोग समझ लेते हैं कि साधु तो मोम का पुतला होना चाहिये । उसे न भूख लगे । न प्यास लगे । न सर्दी लगनी चाहिये । न गर्मी लगनी चाहिये । न उसमें कामवासना की जरा भी उत्तेजना होनी चाहिये । मतलब ये कि साधु से अमूल्य ग्यान सीखने के बजाय उसकी रहनी सहनी । कथनी करनी आदि के मापदन्ड आप तय करते हो । कबीर कहते हैं । कहे हूँ । कह जात हूँ । कहूँ बजाकर ढोल । स्वांसा खाली जात है । तीन लोक का मोल ।..कांकर पाथर जोर के । मस्जिद लयी बनाय । या चढ मौला बांग दे । क्या बहरा हुआ खुदाय ।..दुनियाँ ऐसी बाबरी । पाथर पूजन जाय । घर की चाकी कोई ना पूजे । जिसका पीसा खाय ।..तो ये कुछ उदाहरण हैं । जिनसे सिद्ध होता है । संत में विनमृता ही नहीं होती । बल्कि सभी भाव होते हैं । किसी भी ग्यान का प्रचार करना । आदिकाल से परम्परा रही है । मथुरा के बाबा जय गुरुदेव । शुरूआत में हल चलाते किसान के साथ साथ चलते हुये सतसंग देते थे । शुरूआत में ही हँस महाराज ( सतपाल जी के पिता ) ने प्रचार हेतु काफ़ी मेहनत की । राधा स्वामी के प्रवर्तक की तो लोग झोंपङी ही बारबार तोङ देते थे । कबीर साहेब ने जीवन भर देश में घूमकर प्रचार किया । उनके घर के सामने रहने वाली वैश्या के ग्राहकों ने तो उनके घर में आग ही लगा दी । विवेकानन्द जी । स्वामी रामतीर्थ । ईसामसीह । मुहम्मद साहब । गौतम बुद्ध । नानक जी कितने नाम गिनाऊँ । जिन्होंने घूम घूमकर प्रचार नहीं किया । और ये नहीं कहा कि आओ मैं बताता हूँ । परमात्मा से मिलने की विधि क्या है ?? आपको एक सामाजिक उदाहरण बताऊँ । सरकार स्कूल खोल देती है । फ़िर भी तमाम लोग अपने बच्चों को शिक्षा हेतु भर्ती नहीं करवाते । तब सरकार शिक्षामित्रों आदि के द्वारा उन्हें घर घर से बुलवाती है । और वजीफ़ा । मिड डे मील । मुफ़्त शिक्षा । मुफ़्त किताबें आदि तक देती है । तो आपके अनुसार तो स्कूल खुल जाने पर । जिसको पढना होगा । अपने आप पहुँच जायेगा ।
अब..थोङी देर के लिये आप मैं को लाठी और विनमृता को रस्सी मान लें । या किसी लता का तना मान लें । तो क्या रस्सी या लता । लाठी के स्थान पर इस्तेमाल हो जायेगी ? या रस्सी की जगह लाठी इस्तेमाल हो जायेगी । इसलिये हर चीज का इस्तेमाल अपनी जगह है । और उचित है । ये जीव अग्यान निद्रा में सो रहा है । संतों ने इसको चेताने हेतु समय समय पर बहुत प्रयास किये । कबीर साहब ने कहा है ।.. स्वांस स्वांस पर हरि जपो । वृथा स्वांस न खोय । ना जाने जा स्वांस को । आवन होय न होय ।
अब सबसे महत्वपूर्ण बात । ये ग्यान शास्त्र पढने से नहीं । बल्कि संतो की संगति । उनके सतसंग । उनकी कृपा । और नाम साधना से प्राप्त होता है । जिस प्रकार किसी पेज पर लिखे गीत को पढने मात्र से ही कोई उसको गा नहीं सकता । इसके लिये उसे संगीत का मूल ग्यान । सा रे गा मा पा धा नी । संगीत गुरु और कङे रियाज की आवश्यकता होती है । इसी तरह कोई भी ग्यान । कोई भी साधना आसान नही होती । पढने की ही बात मान लो । तो भी वो सरल कार्य नहीं होता । इसलिये गुङ के कभी गोबर होने का सबाल ही नहीं उठता ।..लेकिन जगत भगति को वैर । वैर जैसे मूस बिलाई । होता है । इसलिये किसी भी साधु के साथ यही मुश्किल होती है । इसीलिये साधु होना ही टेढी खीर है । यही मुश्किल नानक जी के साथ थी । बुद्ध के साथ थी । कबीर के साथ थी । रजनीश के साथ थी । मुहम्मद के साथ थी । ईसा के साथ थी । किसी को नहीं छोङा लोगों ने । किसी के साथ रियायत नहीं बरती । तबरेज की तो खाल तक उतार ली ।
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