24 दिसंबर 2010

तेरी सत्ता के बिना । हिले न पत्ता । खिले न एक हू फ़ूल ।

लेखकीय-- मुंबई के । श्री विजय तिवारी जी ने । कुछ बेहद सार्थक प्रश्न उठाये हैं । यदि आपको लगता है कि आपके पास इन प्रश्नों का जबाब है । तो comment के रूप में दे सकते हैं । )
*** VIJAY ) Jai gurudev ki.. Rajeev ji ( जय गुरुदेव की । तिवारी जी । ) dhanywad mere sawalon ka jawab dene ke liye. ( आपका भी धन्यवाद । मेरे गुरु का आदेश है । तुम दूसरों के जितने भी काम आ सकते हो । आओ । क्योंकि सबके अन्दर वही एक परमात्मा ही है । परहित सरस धर्म नहीं भाई । पर पीडा सम नहीं अधिकाई । ..क्योंकि..बडे भाग मानुस तन पावा । सुर दुर्लभ सद ग्रन्थन गावा । ..और..साधन धाम मोक्ष कर द्वारा । पाय न जेहि परलोक संवारा.. ?? ) Rajeev ji insaan bhedbhav kyun karta hai. ( कुछ ग्यानियों ने इस दुनियां के सिस्टम को जंगलराज कहा है । ) Kyun woh kisi ko dutkarta hai. ( मामूली आदमी भी गरूर में अन्धे हो रहे हैं । इसीलिये अभी के सच्चे संत कह रहे हैं कि कलियुग समय से पहले ही भन्ना उठा । ( अभी कलियुग के सिर्फ़ 5000 वर्ष हुये हैं । और 17000 बाकी है । चारों तरफ़ फ़ैली त्राहि त्राहि से सत्ता ने कलियुग को यहीं समाप्त करने का फ़ैसला लिया है । ) Jaise jahan main kaam karta hun ( CENT.. RAY.. COMPANY ( प्राइवेसी के मद्देनजर मैंने नाम को अस्पष्ट कर दिया गया है । ) wahan hamara jo supervisor hai woh marathi hai ( पर वो भूल गया है । असल में तो वो पहले इंसान है । ) toh woh pahle sabhi marathiyo ko kaam par lagata hai ( शायद इसी को कहा गया है । अंधा बांटे रेवडी । फ़िर फ़िर अपने को देय । ) agar jagah bache toh baaki kisi aur ko. ( इस कर्म से उसके लिये कहीं जगह ही नहीं बचेगी । ) nahi toh hame ghar vapas bhej deta hai. ( आगे के समय में भगवान उसको वापस बार बार 84 में भेजेगा बिकाज उसने एक इंसान की तरह व्यवहार न करके पशुओं की तरह व्यवहार किया । ) Kyun koi apni shaqti ka galat istemaal karta hai ? kyun raajeev ji ? ( हर पावर का भी एक नशा होता है । वह उसी में धुत है । ) kya use ishwar ka bhay nahi lagta ? ( आज का इंसान ईश्वर का भी अपने फ़ायदे के लिये ही इस्तेमाल या याद करता है । ) insaan khud ko sudharta kyun nahi ? ( ये बहुत बडा प्रश्न है । जिसकी तरफ़ बहुत कम लोगों का ध्यान जाता है । ) woh kyun yeh bhool jata hai ki woh sirf is janam me marathi ya marwadi ya bhaiya. ( बिलकुल सही बात है । और अगले जन्मों में तो 84 में उसे गधा । घोडा । कुत्ता । बिल्ली जैसे पशु आदि बनना होगा । और आप जैसों की हाय अलग से झेलनी होगी । ) Jis bhi cast me paida hua ho sirf isi janam ke liye hai. ( और वो भी बहुत थोडे समय के लिये । मनुष्य के जीवन को इसीलिये क्षणभंगुर या पानी का बुलबुला बताया गया है । ) Parmatma ke yahan toh koi jaat nahi wahan toh sab ek hai ( एक नूर ते सब जग उपज्या । कौन भले कौन मंदे । ) toh kyun insaan sirf aaj ka sochta hai ? ( क्योंकि इंसान अग्यात नशे में चूर है । झूठे सुख से सुखी है । मानत है मन मोद । जगत चबैना काल का । कछू मुख में कछू गोद । ) woh apne aane wale kal ki kyun nahi sochta.? ( कुछ ही लोग सोचते हैं । अगर सभी सोचने लगें । तो क्या बात है । ) Kyun koi dusaro ko satata hai kyun ? ( लोग सोचते हैं कि रावण कंस आदि राक्षस कोई अलग राक्षस जाति के थे । पर वे इंसानों में ही थे । और स्वभाव से राक्षस थे । ) Rajeev ji jawab ki prateeksha rahegi. Jai jai gurudev ki. ( ई मेल से । )
अब मेरी बात --- तिवारी जी के इस पूरे ई मेल में मैंने हिंट ( हिंदी में ) दिये हैं । पर वो उत्तर नहीं है । आईये आगे बात करते हैं । दरअसल आपके सभी प्रश्नों में कोई ऐसी हाय हाय वाली बात नहीं है । ये जगत व्यवहार है । जो हमेशा से ही चला आ रहा है । ( अगर ऐसा नहीं होगा । तो या तो जगत समाप्त हो जायेगा । या बेहद नीरस हो जायेगा । ) भले ही इसमें अच्छे बुरे का अनुपात कम ज्यादा होता रहा हो । बुरा ना मानें । तिवारी जी । आज आप अपनी परिस्थिति की वजह से ऐसा सोच रहे हैं । जैसा कि आप सुपरवाइजर के लिये कह रहें हैं । अगर उसकी जगह आप होते तो आप भी वही करते । भले ही अभी आपको लग रहा होगा कि आप नहीं करते ? आज जो आपका आज है । वो आपके बीते कल से निर्मित हुआ है । बुरा जो देखन मैं चलया । बुरा ना मिलया कोय । जब दिल खोजा आपना । मुझसे बुरा न कोय । ये किसी मामूली आदमी के वचन नहीं । बल्कि संतवाणी है । जरा सोचिये । अगर आपकी बात मान ली जाय । तो इससे यह सिद्ध हो जायेगा कि यहां कोई सत्ता ( ईश्वरीय ) नहीं है । और अन्याय का बोलबाला है । पर नहीं । यहां वो सत्ता है । कि...तेरी सत्ता के बिना । हिले न पत्ता । खिले न एक हू फ़ूल । हे मंगल मूल ।
जलचर जीव बसे जल मांहि । तिनको जल में भोजन देय । वनचर जीव बसे वन मांहि । तिनको वन में भोजन देय । थलचर जीव बसे थल मांहि । तिनको थल में भोजन देय । नभचर जीव बसे नभ मांहि । उनको भी तो भोजन देय । ..अरे..ऐसे प्रभु को भोग लगाना । लोगन राम खिलौना जाना ..?? और ये परमात्मा की केन्द्र सत्ता है । जिसमें भक्ति से भाग्य आदि बनता है । त्रिलोक की सत्ता कर्मफ़ल पर आधारित है । यानी जैसा किया । वैसा प्राप्त होगा । और आप यकीन मानें । दोनों ही सत्ताओं का बेहद कडा नियम है । कि तौल में चीनी के एक दाने के बराबर हेरफ़ेर नहीं हो सकता । चींटी जैसे तुच्छ जीव का यहां पूरा पूरा हिसाब रहता है । फ़िर आप सोच सकते हैं कि इतना सख्त राज्य है । तो खुशहाली होनी चाहिये ? आप अपना पिछले कर्मफ़ल का प्रारब्ध ( भाग्य ) लेकर आये हैं । आगे का आपको अभी बनाना है । अब जैसा भी आप ले के आये हैं । उसको हर हालत में भोगना ही है । इसलिये ये कर्मयोनि है । इसलिये ये कर्मक्षेत्र है । इसलिये हे अर्जुन.. युद्ध कर । निरन्तर युद्ध कर । तभी विजय प्राप्त होगी । अब मैं आपको यही सलाह दे सकता हूं कि..कोई ना काहू सुख दुख कर दाता । निज कर कर्म भोग सब भ्राता । इसलिये ..बीती ताहि विसारि दे । आगे की सुधि लेय । भक्ति स्वतंत्र सकल सुख खानी । बिनु सतसंग ना पावहि प्राणी । अगर आपके पास भक्ति का असली नाम होता । तब तो बात ही कुछ और थी ? लेकिन तब तक आप खाली समय में परमात्मा का चिंतन निरन्तर करे । विश्वास रखें । वह सिर्फ़ भाव का भूखा है । आप भाव से उससे प्रार्थना करेंगे । तो वो हर बात सुनेगा । जा पर कृपा राम की होई । तापर कृपा करे सब कोई । निज अनुभव तोहे कहहुं खगेशा । बिनु हरि भजन न मिटे कलेशा । और अंत में ..जय जय श्री गुरुदेव । प्रभु आपकी सुनें । और अपनी शरण में लें ।
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