07 अक्तूबर 2010

दुनिया भरम भूल बौराई ।


नारी जननी जगत की । पाल पोष दे पोस । मूरख राम बिसारि कै । ताहि लगावै दोस ।
नारी आवे प्रीतिकर । सतगुरु परसे आण । जन दरिया उपदेस दै । मांय बहन धी जाण ।
दरिया लच्छन साध का । क्या गृही क्या भेष । निहकपटी निपंख रहे । बाहर भीतर एक ।
बिक्ख छुडावे चाह कर । अमृत देवे हाथ । जन दरिया नित कीजिये । उन संतन को साथ ।
दरिया संगत साध की । सहजे पलटे बंस । कीट छांड मुक्ता चुगे । होय काग से हंस ।
दरिया संगत साध की । कलविष नासै धोय । कपटी की संगत किया । आपहु कपटी होय ।
******
दुनिया भरम भूल बौराई ।
आतम राम । सकल घट भीतर । जाकी सुध न पाई । मथुरा कासी । जाय द्वारिका । अड़सठ तीरथ न्हावैं ।
सतगुर बिन । सोजी नहीं । कोई फिर फिर । गोता खावै ।
चेतन मूरत । जड़ को सेवै । बड़ा थूज । मत गैला । देह आचार । किये काहा । होई भीतर । है मन मैला ।
जप तप संजम । काया कसनी । सांख जोग । ब्रत दाना । या ते नहीं ब्रह्म से मैला । गुन अरु करम बंधाना ।
********
मुसलमान हिंदू काहा । षट दर्शन रंक राव । जन दरिया निज नाम बिन । सब पर जम का डाव ।
मरना है रहना नहीं । या में फेर न सार । जन दरिया भय मानकर । अपना राम संभार ।
तीन लोक चौदह भुवन । राव रंक सुलतान । दरिया बंचे को नहीं । सब जंवरे को खान ।
जगत जगत कर जोड़ ही । दरिया हित चित लाय । माया संग न चालही । जावे नर छिटकाय ।
सुई डोरा साह का । सुरग सिधाया नांह । जन दरिया माया यहू । रही यहां की यांह ।
एक टिप्पणी भेजें