15 सितंबर 2010

निर्विचार तुम्हारी वह अवस्था है



ल्यौ लागी तब जाणिए । जे कबहूं छूटि न जाई । वह लौ भी क्या । जो लगे । और छूटे ? वह तो मन का ही खेल रहा होगा । इसे थोड़ा समझो । जो लगे । और छूटे । वह 1 विचार ही रहा होगा । विचार आते हैं । चले जाते हैं । लौ तो वही है । जो निर्विचार में लग जाए । फिर आना जाना नहीं है । फिर छूटेगा क्या ? फिर तो तुम्हारा स्वभाव बन गई लौ । विचार की तरंगें तो आती हैं । जाती हैं । आज है । कल नहीं है । लगती है । छूट जाती है । क्षण भर को रहती है । चली जाती है । विचार के लिए । तो तुम 1 धर्मशाला हो । वे रुकते हैं इसलिए कि कुछ देते भी नहीं । मुफ्त रुकते है । भीड़ भड़क्का किए रहते हैं तुम्हारे भीतर । फिर चले जाते हैं । तुम तो बीच का 1 पड़ाव हो ।
इसलिए अगर यह लौ भी 1 यात्री की तरफ ही तुम्हारे पास आए । रात भर रुके । और सुबह चली जाए । तो यह लौ ही नहीं है । दादू कहते हैं - इसको तुम लौ मत कहना । लौ तो वही है - लौ लागी तब जाणिए । जे कबहूं छूटि न जाइ । वह उसका लक्षण है । असली लौ का लक्षण है कि - वह छूटे न ।
तब इसका अर्थ हुआ कि असली लौ तभी लग सकती है । जब विचार से ज्यादा गहरे तल पर उसकी चोट हो । निर्विचार में लगे । क्योंकि निर्विचार आता न जाता । सदा है । निर्विचार तुम्हारी वह अवस्था है । जो आती जाती नहीं । वह तुम्हारा स्वभाव है ।
जीवन यौ लागी रहे । मूवा मंझि समाइ । और जीते जी तो लगी ही रहेगी । मरकर भी नहीं मिटती । तुम मिट जाओगे । लौ अनंत में समा जाएगी ।
यह बड़ी प्यारी बात है । भक्त जब खोता है । तो भक्त तो खो जाता है । उसकी लौ का क्या होता है ? लौ तो सारे संसार में लग जाती है । भक्त की लौ भटकती रहती है संसार में । और न मालूम कितने सोयों को जगाती है । न मालूम कितने अंधों की आंखें खोलती है । न मालूम कितने बंद हृदयों को धड़काती है । न मालूम कितनों को प्रेम में उठाती है । प्रार्थना में जगाती है । भक्त तो खो जाता है । पर उसकी लौ संसार में बिखर जाती है । वह भटकती है । घूमती है ।
बुद्ध कृष्ण क्राइस्ट जरथुस्त्र तो खो जाते हैं । लेकिन उनकी आग उनकी आग आज भी जलती है । तुम बुद्ध को तो न पा सकोगे । अब वह बात गई । वह बूंद तो समा गई सागर में । बुद्ध में जो जली थी प्यास । बुद्ध में जो जला था ज्ञान । वह अब भी मौजूद है । वह अब भी संसार में समाया हुआ है । तुम्हारे पास अगर थोड़ी भी समझ हो । तुम उससे आज भी जुड़ सकते हो । अगर तुम्हारा प्रेम हो । तो आज भी तुम बुद्ध से उतना ही लाभ ले सकते हो । जितना बुद्ध के साथ उनके जीवन में उनके शिष्यों ने लिया होगा । लौ तो समा जाती है संसार में । अस्तित्व में ।
मन ताजी दादू कहते हैं - मन को घोड़ा करो । वह सवार बनकर बैठ गया है । मन पर चढ़ो । चेतन चढ़े । चढ़ाओगे कैसे चेतन को मन पर ? अगर चेतन जग जाए । तो चढ़ जाता है । जागना । चढ़ना है । अगर तुम होश से भर जाओ । अगर तुम मन को देखने वाले बन जाओ । अगर मन के साक्षी बन जाओ । चेतन चढ़ जाता है । जब तक तुम्हारा साक्षी नहीं है मौजूद । तब तक मन चढ़ा रहेगा । तुम गुलाम रहोगे । मन चलाएगा । तुम पीछे पीछे घसीटोगे ।
मन ताजी चेतन चढ़े । लौ की करे लगाम ।
और वह जो लौ है परमात्मा की । उसको बना लो लगाम । उस लौ से ही चलाओ मन को । बड़ा प्यारा वचन है । उस लौ से ही चलाओ मन को । मन की गतिविधि में वह लौ ही समा जाए । मनुष्य लौ की मानकर चले वहीं जाओ । जहां जाने से परमात्मा मिले । वही करो । जिसे करने से परमात्मा मिले । वही होओ । जो होने से परमात्मा मिले । बाकी सब असार है ।
मन ताजी चेतन चढ़े । लौ की करे लगाम ।
खाओ । तो परमात्मा को पाने के लिए । पीयो । तो परमात्मा को पाने के लिए । जगो । तो परमात्मा को पाने के लिए । सोओ । तो परमात्मा को पाने के लिए । लौ की करो लगाम ।
सबद गुरु का ताजना - और गुरु के शब्द को कोड़ा बन जाने दो । सबद गुरु का ताजना । वह तुम्हें चोट करे । तो भयभीत मत हो जाओ । वह प्यार करता है । इसीलिए चोट करता है । वह तुम्हें मारे । तो घबड़ाओ मत । तो शत्रुता मत पाल लो । क्योंकि वह तुम्हें मारता है सिर्फ इसीलिए कि उसकी करुणा है । वह तुम्हें खींचे तुम्हारे रास्तों से । तो संदेह मत करो । क्योंकि अगर संदेह किया । तो वह खींच न पाएगा । भरोसा चाहिए । भरोसा होगा । तो ही खींचे जा सकोगे ।
सबद गुरु का ताजना । और वह जो गुरु का शब्द है । उसे तुम कोड़ा बना लो । और जब भी मन तुम्हारा यहां वहां जाए । लगाम की न माने । लौ की न माने । लगाम की मान ले । तब तो कोड़े की कोई जरूरत नहीं । अगर सब तरफ से परमात्मा पर पहुंचने का आयोजन चलता रहे । तब तो कोड़े को कोई जरूरत नहीं । लेकिन कभी कभी लगाम की माने । घोड़ा जिद्दी हो । जैसे कि सब घोड़े हैं । सभी मन हैं । तो फिर कोड़े की जरूरत पड़े । तो फिर तुम अपने हाथ में निर्णय मत लो । निर्णय गुरु के हाथ में दे दो । फिर वह जो कहे । वही करो । उस पर ही छोड़ दो । उसका अर्थ होता है - सबद गुरु का ताजना ।
बुद्ध ने कहा है कि दुनिया में 4 तरह के लोग हैं । 1 तो उन घोड़ों जैसे हैं । जिनको तुम मारो । ठोको । पीटो । तब बमुश्किल चलते हैं । और वह भी घड़ी 2 घड़ी में भूल जाते हैं । फिर खड़े हो जाते हैं । दूसरी तरह के लोग उन घोड़ों की तरह हैं । जिनको तुम मारो । तो याद रखते हैं । चलते हैं । जल्दी भूल नहीं जाते । तीसरे उन घोड़ों की तरह हैं । जिनको मारने की ज्यादा जरूरत नहीं । सिर्फ कोड़े को फटकारो । मारो मत । और घोड़ा सावधान हो जाता हैं कि अब अगर चूके । तो कोड़ा पड़ेगा । वह चलने लगता है । और चौथे - बुद्ध ने कहा है कि वे बड़े अनूठे लोग हैं । वे वे हैं । जिनको फटकारने की भी जरूरत नहीं पड़ती । कोड़े की छाया दिखाई पड़ जाए कि कोड़ा उठ रहा है । छाया दिखाई पड़ जाए घोड़े को । बस काफी है । घोड़ा रास्ते पर आ जाता है ।
तुम इन 4 घोड़ों में कहां हो ? ठीक से अपने को पहचान लो । और चौथा घोड़ा बनने की कोशिश करो । सिर्फ सबद गुरु का ताजा, तुम्हारे लिए कोड़ा बन जाए । तो धीरे धीरे उसकी छाया भी तुम्हें चलाने लगेगी । उसका स्मरण तुम्हें चलाने लगेगा । याद भर आ जाएगी गुरु के शब्द की । तुम रुक जाओगे कहीं जाने से । कहीं और चलने लगोगे ।
कोई पहुंचे साध सुजान तो इन 3 बातों को पूरा कर लेते हैं । ऐसे कुछ साधु पुरुष, जागे हुए पुरुष पहुंच पाते हैं ।
आदि अंत मध एकरस टूटै नहि धागा ।
दादू एकै रहि गया जब जाणे जागा ।
वह तो परमात्मा का आनंद है । वह सदा सम स्वर है । शुरू में भी वैसा । मध्य में भी वैसा । अंत में भी वैसा । उसमें कोई परिवर्तन नहीं है । वह शाश्वत है । उसमें कोई रूपांतरण नहीं है । वह बदलता नहीं है । वह सदा एकरस है ।
आदि अंत मध्य एकरस टूटै नहीं धागा । जब तुम्हारा धागा इस एकरसता से जुड़ जाए । और टूटे न । तभी समझना मंजिल आई । उसके पहले विश्राम मत करना । उसके पहले पड़ाव बनाना पड़े । बना लेना । लेकिन जानना कि यह घर नहीं है । रुके हैं रात भर विश्राम के लिए । सुबह होगी । चल पड़ेंगे । जब तक ऐसी घड़ी न आ जाए कि उस एकरसता से धागा बंध जाए पूरा का पूरा । टूटै नहीं धागा । तब तक मत समझना मंजिल आ गई ।
बहुत बार पड़ाव धोखा देते हैं - मंजिल का । जरा सा मन शांत हो जाता है । तुम सोचते हो । बस हो गया । जल्दी इतनी नहीं करना । जरा रस मिलने लगता है । आनंद भाव आने लगता है । सोचते हो । हो गया । इतनी जल्दी नहीं करना । ये सब पड़ाव हैं । प्रकाश दिखाई पड़ने लगा भीतर । मत सोच लेना कि मंजिल आ गई । ये अभी भी मन के ही भीतर घट रही घटनाएं हैं । अनुभव होने लगे अच्छे सुखद । तो भी यह मत सोच लेता कि पहुंच गए ।
क्योंकि पहुंचोगे तो तुम तभी । दादू एकै रहि गया जब जाणे जागा । तक जानेंगे दादू कहते हैं कि तुम जाग गए । जब 1 ही रह जाए । तुम और परमात्मा 2 न रहो । अगर परमात्मा भी सामने खड़ा दिखाई पड़ जाए । तो भी समझना कि अभी पहुंचे नहीं । फासला कायम है । अभी थोड़ी दूरी कायम है । 1 ही हो जाओ । दादू एकै रहि गया - अब 2 न बचे । जब जाणे जागा - तभी जानना कि जाग गए । तभी जानना कि घर आ गया ।
अर्थ अनुपम आप है । और दादू कहते हैं - मत पूछो कि उस घड़ी में कैसे अर्थ के फूल खिलेंगे ? मत पूछो कि कैसी अर्थ की सुवास उठेगी ?
अर्थ अनुपम आप है । वह अर्थ अनुपम है । उसकी कोई उपमा नहीं दी जा सकती । इस संसार में वैसा कुछ भी नहीं है । जिससे इशारा किया जा सके । इस संसार के सभी इशारे बड़े फीके हैं । इस संसार के इशारों से भूल हो जाएगी । अर्थ अनुपम अद्वितीय है । वह बेजोड़ है । वैसा कुछ भी नहीं है ।
अर्थ अनुपम आप है । बस वह अपने जैसा आप है । और अनरथ भाई - और उसके अतिरिक्त जो भी है । सब अर्थहीन है ।
दादू ऐसी जानि करि तासौ ल्यो लाइ । और ऐसा जानकर उसमें ही लौ को लगा दो । दादू कहते हैं - मैंने ऐसा जानकर उसमें ही लौ लगा दी । दादू ऐसी जानि करि ता सौ ला लगाइ । उसमें ही लौ लगा दी ।
लौ शब्द समझ लेने जैसा है । दिए में लौ होती है । तुमने कभी खयाल किया कि दिए की लौ । तुम कैसा भी दिए को रखो । वह सदा ऊपर की तरफ जाती है । दिए को तिरछा रख दो । कोई फर्क नहीं पड़ता । लौ तिरछी नहीं होती । दिए को तुम उल्टा भी कर दो । तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता । लौ फिर भी ऊपर की तरफ ही भागी चली जाती है । पानी का स्वभाव है । नीचे की तरफ जाना । अग्नि का स्वभाव है । ऊपर की तरफ जाना ।
लौ का प्रतीक कहता है । तुम्हारी चेतना जब सतत ऊपर की तरफ जाने लगे । शरीर की कोई भी अवस्था हो । सुख की हो कि दुख की हो । पीड़ा की हो । जीवन की हो कि मृत्यु की हो । जवानी हो कि बुढ़ापा । सौंदर्य हो कि कुरूपता । सफलता हो कि असफलता । कोई भी अवस्था में रखा हो दिया । इससे कोई फर्क न पड़े । लौ सदा परमात्मा की तरफ जाती रहे । ऊपर की तरफ जाती रहे ।
दादू ऐसी जानि करि तासों ल्यौ लाई ।
ये एक एक शब्द प्यारे हैं । मैं फिर दोहरा देता हूं । 
जोग समाधि सुख सुरति सों । सहजै सहजै आव ।
मुक्ता द्वारा महल का । इहै भगति का भाव ।
ल्यौ लागी तक जाणिए । जे कबहूं छूटि न जाइ ।
जीवन ज्यो लागी रहे मूवा मंझि समाइ । 
मन ताजी चेजन चढ़े । ल्यौ की करे लगान ।
सबद गुरु का ताजना, कोई पहुंचे साध सुजान ।
आदि अंत मध एक रस । टूटैं नहि धागा ।
दादू एकै रहि गया । जब जाणै जागा ।
अर्थ अनूपम आप है । और अनरथ भाई ।
दादू ऐसी जानि करि । तासौं ल्यौ लाई । ओशो 
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