09 अगस्त 2010

शरीर में ब्रह्माण्ड की स्थिति

इस ब्रह्माण्ड में जो गुण विधमान हैं । वे मनुष्य शरीर में भी हैं । सूर्यादि ग्रह । आकाश पाताल । पर्वत लोक दीप । समुद्र । सब ग्रह ये सब कुछ शरीर में है । पैर के नीचे तललोक । पैर के ऊपर वितललोक । दोनों
जानुओं में सुतललोक । सक्थि प्रदेश में महातल लोक है । उरु भाग में तलातल लोक । गुह्य स्थान में रसातल लोक है । कटि प्रदेश में पाताल लोक । नाभि के मध्य में भूर्लोक । उसके ऊपर भुवर्लोक । ह्रदय में स्वर्गलोक । कण्ठदेश में महर्लोक । मुख में जनलोक । मस्तक में तपोलोक । महारन्ध्र में सत्यलोक है । इसी प्रकार मनुष्य़ के इसी शरीर में चौदह भुवन विधमान है । शरीर के त्रिकोण में मेरु । अधकोण में मन्दर । दक्षिण में कैलाश । वामभाग में हिमालय । ऊर्ध्वभाग में निषध । दक्षिण में गन्धमादन । और वामरेखा में मलय पर्वत इस प्रकार इन सात पर्वतों की स्थिति है । शरीर के अस्थिभाग में जम्बू दीप । मज्जा में शाक दीप । मांस में कुश दीप । शिराओं में क्रौंच दीप । त्वचा में शाल्मलि दीप । रोम समूह में प्लक्ष दीप । नखों में पुष्कर दीप । स्थित हैं । इसके बाद सागरों की स्थित है । मूत्र में क्षारोद सागर । शरीर के क्षार तत्व में क्षीर सागर । श्लेष्मा में सुरोदधि सागर । मज्जा में घृत सागर । रस में रसोदधि सागर । रक्त में दधि सागर । काक में लटकते हुये मांस में स्वादूदक सागर । शुक्र में गर्भोदक सागर है । इसी प्रकार नादचक्र में सूर्य । बिन्दुचक्र में चन्द्रमा । नेत्र में मंगल । ह्रदय में बुध । विष्णुस्थान मे गुरु । शुक्र में शुक्र । नाभि में शनि । मुख में राहु । पायु में केतु माना जाता है । मनुष्य के सिर से लेकर पूरा शरीर इसी सृष्टि के रूप में विभक्त है ।
भूख प्यास क्रोध जलन मूर्छा । बिच्छू के डंक और सर्प के दंश के समान सब कष्ट भी इसी शरीर में ही रहते हैं । समय पूरा हो जाने पर सब की मृत्यु निश्चित है । यमलोक में गये हुये जीव के आगे आगे वही लोग दौडते हैं । जो पापी हैं । अधम हैं । दया धर्म से दूर हैं । जम दूत उनको बाल पकडकर घसीटते हुये रेगिस्तान के समान तपती हुयी भूमि में दहकते हुये अंगारों के बीच से ले जाते है । इन पापियों को यमलोक की झोंपडियों में तब तक रहना पडता है । जब तक पुनर्जन्म नहीं होता । जीव कर्मानुसार जन्म लेता और मरता है । आयु कर्म धन विधा और मृत्यु ये पांचों प्राणी के गर्भ में रहने के समय ही निश्चित हो जाती है । उत्तम प्रकृति वाला व्यक्ति अपने सतकर्म से ऊंचे कुल में पैदा होता है । और सुख भोगता है । किन्तु ज्यों ज्यों उसकी दुष्कर्म में प्रवृति होती जाती है । वैसे वैसे ही उसका जन्म भी नीच कुल में होने लगता है । और फ़िर उसी के प्रभाव से वह दरिद्रता । रोग । मूर्खता आदि अन्य कई दुखों को भोगता है । इस तरह पूर्वजन्म में किये गये पाप पुण्य से बंधे जीव बार बार इस संसार में आवागमन का दुख भोगते हैं । हजारों प्रकार के दुख से व्याप्त इस संसार में रंचमात्र भी सुख नहीं है । इसलिये मनुष्य को साबधानी से मुक्ति का निरंतर प्रयास इसी जीवन में कर लेना चाहिये क्योंकि ये ( मनुष्य ) जीवन फ़िर कब मिले । इसका पता नहीं । कब समाप्त हो जाय इसका पता नहीं ?
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" जाकी रही भावना जैसी । हरि मूरत देखी तिन तैसी । "
" सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिम हरि शरण न एक हू बाधा । "
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