22 अगस्त 2010

फ़क्कडानन्द बाबा



फ़क्कडानन्द बाबा से मेरी मुलाकात लगभग सवा दो साल पहले हुयी थी । उस समय मैं राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ इत्तफ़ाक से गुरुजी के पास सतगुरु श्री शिवानन्द जी महाराज...परमहँस ही बैठा था । जैसा कि मेरा कई बार का अनुभव है । एक साधु दूसरे साधु से हमेशा भारी अहम के साथ ही मिलता है । बशर्ते श्रद्धा का कोई कारण न जुडा हो । वह अपने मत अपने ग्यान अपने ध्यान को ही श्रेष्ठ मानता है । फ़क्कड संत मत sant mat का दीक्षित बाबा था । इस बात ने मेरी रुचि फ़क्कड से बातचीत में बडाई । हांलाकि अदैत ग्यान आत्म दर्शन में सत्रह साल के लगभग गुजारने के बाद मुझे तन्त्र मन्त्र ढोंगी अघोरी कैसा भी पंथ कोई भी मत हो । सब बाबाओं से बात करने में मजा ही आता है । लेकिन आत्मग्यान या संत मत sant mat की बात ही कुछ और है । तुरन्त ही बात ध्यान और उसकी उपलब्धि पर आ गयी । फ़क्कड ने कुछ अहंकार के साथ बताया कि उसके मंडल के इतने लोग दिव्य साधना DIVY SADHNA ध्यान की ऊंची अवस्था में है । इसको ये दिखता है । उसको वो दिखता है । महाराज जी उसकी बात सुनकर मुस्कराये । सच बात का अन्दाज ही कुछ और होता है । और झूठ का खोखलापन स्वयं ही साफ़ नजर आता है । जाहिर था कि फ़क्कड अग्यानतावश झूठ बोल रहा था । मैंने कहा । औरों की बात छोडो । तुम बताओ । तुम्हें क्या अनुभव हुये ? या अब तक क्या प्राप्त हुआ ? क्योंकि आठ साल की दीक्षा और ध्यान का अभ्यास मामूली बात नहीं होती ।
फ़क्कड ने फ़िर सुना सुनाया झूठ बोला । आकाश दिखायी दिया । पहाड दिखाई दिये । मैंने कहा । उस पहाड के पीछे बरगद के नीचे एक यक्षिणी मिलती है । वो बताओ । मोटी है या पतली ? और नये आदमी से पहली बार मिलने पर क्या कहती है ?
ये सुनते ही फ़क्कड झूठ के आसमान से हकीकत की जमीन पर उतर आये और बोले । महाराज सच कहूं तो मुझे कोई अनुभव नहीं है । बस http://satguru-satykikhoj.blogspot.com/ के लिये भटक रहा हूं । आप अगर कोई सहायता कर सकते हों तो अवश्य कृपा करे । मैंने कहा । आठ साल कहां लगते है ? पात्र में ललक और लगन हो तो तुरन्त का ही काम है । परमात्मा कहीं खोया नहीं है । उल्टे तुम नशे में हो । तुम खोये हुये हो । फ़िर फ़क्कड की महाराज जी सतगुरु श्री शिवानन्द जी महाराज...परमहँस से बात होने लगी । महाराज जी स्वभाव अनुसार ही कम बोलते हैं । उन्होंने कहा । तुम्हारे घर में ( शरीर ) बिजली बगैरा सब फ़िट हो चुकी है । केवल कुछ बल्ब लगाने हैं । और खम्बे ( चेतनधारा ) से तार जोडकर करेंट चालू कर देना हैं । फ़क्कड ने महाराज जी के पैर पकड लिये । और बोला । तो जोडिये महाराज जी । देर किस बात की । मैं कब से इसी की तलाश में घूम रहा हूं । उस समय शाम के सात बजे थे । महाराज जी ने सुबह फ़क्कड को बुलाया । दूसरे दिन सुबह आठ बजे जब मैं महाराज जी के कक्ष में गया । तो फ़क्कड अति प्रसन्न मुद्रा में मुझे मिले । वह सुबह चार बजे ही आ चुके थे । और महाराज जी के ध्यान आदि द्वारा उनकी बिजली जुड चुकी थी । फ़क्कडानन्द आज महाराज जी के शिष्यों में शामिल है । और बिलकुल झूठ नहीं बोलते हैं ।
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