05 अगस्त 2010

सृष्टि और प्रलय का चक्कर


जो इस सृष्टि और प्रलय का चक्कर समझ जाते हैं । वे तीन तापों । आध्यात्मिक । आधिदैविक । आधिभौतिक ।को जानकर इनसे परे । ग्यान । वैराग्य का मार्ग अपनाते है । और मोक्ष को सत्य को अपनाते है । लेकिन इससे पहले संसार चक्र का जानना जरूरी होता है । जिसको जाने बिना मोक्ष का पुरुषार्थ संभव ही नहीं है । जब मृत्यु के समय प्राणी इस शरीर का त्याग करके दूसरे सूक्ष्म शरीर में प्रविष्ट होता है । इस मृत्युलोक से मृत्यु के बाद जीव को यमराज के दूत दिन की अवधि में यमलोक ले जाते हैं । यमलोक के मार्ग में जीव अपने परिजनों द्वारा दिये पिण्डदान और तिलोदक को खाता है । पाप करने वाला नरक । और पुण्य
करने वाला स्वर्ग में जाता है । इसके बाद पाप या पुण्य का फ़ल खत्म हो जाने पर । वह जीव फ़िर से गिरा दिया जाता है । लौटकर आया हुआ ये जीव स्त्रियों के गर्भ में आता है । और वहां नष्ट न होकर वह दो बीजों के आकार को धारण करता है । उसके बाद वह कलल । फ़िर बुदबुदाकार बन जाता है । इसके बाद बुदबुदाकार रक्त से मांसपेशी का निर्माण होता है । मांसपेशी से अण्डाकार मांस बन जाता है । वह एक पल ( परिमाण या तौल ) के बराबर होता है । उस अण्डे से अंकुर बनता है । उस अंकुर से अंगुली नेत्र । नाक । मुख । कान आदि अंग और उप अंग पैदा होते हैं । इसके बाद उस विकसित हो चुके अंकुर में उत्पादक शक्ति का संचार होता है । और उसके हाथ पैरों की उंगलियों में नाखून । शरीर में त्वचा । रोम । तथा बाल निकलने लगते हैं । इस प्रकार गर्भ में बढता हुआ ये जीव नौ महीने तक उल्टा लटका हुआ । अनेकों कष्ट भोगने के बाद । दसवें महीने में जन्म लेता है । जन्म लेते ही संसार में व्याप्त माया उस पर परदा डाल देती है । और गर्भकाल में प्रभु भक्ति द्वारा अबकी बार मोक्ष प्राप्त करने का वह खुद का ही निश्चय भूल जाता है । वह नरक स्वर्ग की याद भी भूल जाता है । जो उसे गर्भकाल में याद थी ।
फ़िर यह जीव बाल अवस्था । कुमार अवस्था । युवा अवस्था और अंत में वृद्ध अवस्था को प्राप्त होने के बाद पुनः मृत्यु को प्राप्त होता है । इस प्रकार यह जीव संसार चक्र में घटीयंत्र के समान घूमता हुआ विवश हो जाता है । नरक भोग के बाद जीव पाप योनि में जाता है । ये कृमि आदि योनियां हैं । दूसरे की निंदा करने वाला । कृतघ्न । दूसरे की मर्यादा नष्ट करने वाला । निर्दयी । नीच कार्यों में रुचि । पराई औरत के साथ सम्भोग । पराये धन का लालच । अपवित्र रहने की आदत । देव निंदा । मर्यादा रहित अशिष्ट व्यवहार । कंजूसी । तथा मनुष्यों को मारने वाला । ये नरक भोगने के पश्चात जन्म लिये हुये मनुष्य के लक्षण हैं ।
दया । सज्जन वार्तालाप । परलोक सुधारने की चेष्टा । सतकर्म । सत्य धर्म का पालन । परहित । मुक्ति हेतु चिंतन । मुक्ति हेतु साधना । वेद प्रामाणिक बुद्धि । साधु संत । गुरुजन की सेवा । साधुओं के बताये नियम का पालन । सब के साथ प्रेम भाव । ये स्वर्ग से आये जीवों के लक्षण हैं ।
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" जाकी रही भावना जैसी । हरि मूरत देखी तिन तैसी । "
" सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिम हरि शरण न एक हू बाधा । "
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