13 जुलाई 2010

असली ..नकली..?


क्या आप जानते हैं कि भारत में सात लाख गाँव और वयालीस लाख रजिस्टर्ड साधु हैं । यानी एक गाँव के हिस्से में छह साधु आते हैं । यदि इतने साधु असली साधुता युक्त हों । वास्तविक न सही । साधुता का सतही ग्यान भी रखते हों । तो भारत से तमाम झगङें और जन जीवन के कलेश विदा हो जाँय ।
शंकर जी ने कहा है । निज अनुभव तोय । कहूँ खगेशा । बिनु हरि भजन । न मिटे कलेशा । इस असली हरि भजन को जानने वाले साधु गिनती में बहुत थोङें होंगे । और इसको उच्च स्तर पर जानने वाले तो
उंगलियों पर गिने जा सकते हैं । एक और बात आपको बताऊँ । जितना झगङा और कलेश आप ग्रहस्थों में नहीं होता । जितना इन साधुओं में होता है । मठाधीश बनने की जुगाङ । गद्दी की जुगाङ । धन की
प्राप्ति के निरंतर प्रयत्न । अपने लिये निजी आश्रम बनाने की चिंता । अपने शिष्य बङाने और अपना मत प्रचार करने की चिंता । दूसरे के ग्यान और उपलब्धि को नीचा बताना । दूसरे के मत को नीचा बताना । ये वे बातें हैं । जो मैंने अपने साधु जीवन में अक्सर देखी हैं । इनमें कुछ मत के साधु तो इतने उग्र स्वभाव के होते हैं । कि अपनी बात नीची होते देख दूसरे की हत्या कर देते हैं या हत्या पर उतारू हो जाते हैं । मोटी माया सब तजे । झीनी तजी न जाय । मान बङाई ईर्ष्या । लख चौरासी लाय ।
80 % साधु भिक्षा में अच्छी कमाई देखकर साधु हो जाते हैं । इन्हीं में कुछ ऐसे भी होते हैं । जिन्हें बिना काम किये खाने की आदत हो जाती है । कुछ अपराधी तबके के लोग पुलिस आदि से बचने के लिये अपनी पहचान छुपाने हेतु साधु हो जाते हैं । कुछ ग्रहस्थी का भार उठाने में नाकाम साबित होतें हैं । और अंत में साधु हो जाते हैं । कुछ स्त्री ( से सम्भोग ) के योग्य नहीं होते । कुछ । नारि मुई । ग्रह सम्पत्ति नासी । मूङ मुङाय । भये सन्यासी । होते हैं । वास्तव में ऐसे ही साधु जिन्होंने कपङे रंगकर पहन लेना ही साधुता जाना है । साधुओं पर से जनता का विश्वास उठा दिया है । दुर्भाग्य से ऐसे ही साधुओं की गिनती आज ज्यादा है । असली साधु का न कोई जाति होती है । और न ही संसार की चीजों से प्रयोजन । जाति न पूछो । साधु की । पूछ लीजिये ग्यान । मोल करो तलवार का ।
पढा रहन दो म्यान ।
आईये आपको असली साधु के बारे में कुछ बताते हैं । साधु की शुरुआत परमात्म प्रेम की और बङने से होती है । जिसकी शुरुआती अवस्था को " साधक " कहा गया है । साधक यानी साधने वाला । और जो साधने में निपुणता प्राप्त कर रहा है । वो साधु होता है । क्योंकि साधु का लक्ष्य ही संसार से हटकर परमात्मा को जानना और अपने उस अनुभव को ग्रहस्थ आदि में बाँटना होता है । वो ग्रहस्थों के दुख शमन के उपाय और परमात्म प्राप्ति के उपदेश करता है । और बदले में ग्रहस्थ उसके वस्त्र भोजन आदि में सहायता कर सेवा करता है । ये एक सुन्दर व्यवस्था थी । जो कालान्तर में नकली साधुओं और धर्मभीरु जनता की मानसिकता से दूषित हो गयी । और इसके लिये साधु से ज्यादा जनता जिम्मेवार है ।
वास्तव में साधु क्या है ? कोई साधु आकर किसी कालोनी के मन्दिर या वृक्ष आदि के नीचे लोगों को तत्व ग्यान का उपदेश करे । तब उसको जलपान भोजन आदि करा दिया जाय । और पर्व विशेष या अपने घर में कोई समारोह आदि होने पर हम उसको वस्त्र या उसकी जरूरत का सामान भेंट कर सकते हैं । जब ये साधु खूब परिचित हो जाय । तब उससे ग्यान आदि के सम्बन्ध में बात कर सकते हैं ।
मैं क्योंकि साधुओं को निकट से जानता हूँ । अतः आपको इनकी लीला बता रहा हूँ । मान लीजिये ।आपके शहर के आसपास किसी स्थान पर एक या चार साधु इकठ्ठा रहते हैं । अब इन्होंने अपने बिजनेस की सेटिंग कर ली । सोमवार के दिन एक साधु फ़लां स्थान ( कालोनी या मुहल्ला ) से भिक्षा या धन का संग्रह करेगा । मंगल को दूसरे स्थान पर । इसी तरह पूरे सप्ताह का कार्यक्रम तय रहता है । अब मंगल वाले दिन आपके घर उसी टुकङी का दूसरा साधु आ जाता है । बुध को तीसरा । और गुरुवार को चौथा । एक ही साधु रोज रोज आय । तो आपको भी चिङ होगी । आप काफ़ी दिन बाद आया सोचकर उसको भिक्षा देते रहते हैं । पर आपकी भिक्षा एक ही जगह जा रही है । एक साधु एक दिन में औसत कम से कम बीस से तीस किलो आटा और पचास से सौ रुपये आराम से ले जाता है । और
खाने के समय पर पहुँच जाने पर बहुत लोग खाना भी खिला देते हैं । इस तरह ढाई सौ से लेकर चार सौ
रुपये तक साधु आराम से कमा लेता है । और फ़िर बहुत से साधु रात को शराब पीते हैं ।
कुछ समय पहले जब मैं आगरा के बजाय एक अन्य स्थान पर रहता था । एक साधु मेरे पास ही रहता था । एक दिन वो मुझे कहीं जाने की तैयारी करता मिला । मैंने कहा । बाबा कहाँ जा रहा है ? वो ढीटता से हँसता हुआ बोला । कि मालूम नहीं " सीजन " ( धन कमाने का ) है । मैंने कहा । किस तरह ?
वो बोला । मैं तीन चार हजार रुपये लेकर तीन महीने तक जगह जगह जाऊँगा । यात्रा और खाना अधिकांश मुफ़्त हो ही जाता है । इन दिनों साधुओं को कम्बल बाँटे जाते हैं । तो मुझे मिलने वाले कम्बल तो मैं इकठ्ठे कर ही लेता हूँ । कुछ साधु जो चरस स्मैक आदि का नशा करते हैं । अपने कम्बल तीस रुपये से लेकर पचास रुपये का तुरन्त नशे के लिये बेच देते हैं । ऐसे कम्बल इकठ्ठे करके मैं बाद में उनको ढाई सौ । तीन सौ तक बेच देता हूँ ? ये एक नया बिजनेस मुझे पता चला ?
इसी तरह स्थान का नाम तो मैं नहीं बताऊँगा । पर अपराधों के लिये भारत भर में कुख्यात है । यू पी का ये जिला । मैं रेलवे स्टेशन पर रात बारह बजे के करीब था । अचानक दो सौ साधु धीरे धीरे करके एक चमत्कार की तरह स्टेशन पर प्रकट हो गये । मुझे बङा आश्चर्य हुआ । मैंने अपने साथी हरि नारायण से पूछा । कि ये साधु वेटिंग रूम से निकलकर आ रहें हैं । जबकि कुछ समय पहले एक भी साधु नहीं था ।
उन्होंने कहा । कि ये साधु नहीं हैं । यहाँ रहने वाले एक जाति विशेष के उठाईगीरे हैं । ये स्टेशन तक सादा कपङों में आतें हैं । ताकि कोई लोकल आदमी इन्हें पहचान न लें । स्टेशन में ये साधु बाना धारण कर लेते हैं । ये ट्रेन के समय आ जाते हैं । और ट्रेन में मुफ़्त यात्रा करके विभिन्न स्थानों पर दो तीन दिन के लिये माँगने चलें जाँयेंगे । लेकिन इनका मुख्य उद्देश्य ट्रेन में सोते हुये आदमी या असावधान आदमी का अटैची या अन्य सामान चोरी करना है । ये जेब काटने में भी निपुण होते हैं । साधु समझकर आदमी इनको शक की नजर से नहीं देखता । इस तरह ये बङा हाथ मारकर घर लौट जाते हैं और किसी कारणवश यदि चोरी का माल हाथ न लगे । तो अन्य क्षेत्रों में जाकर झूठे टायप के हाथ देखना । उल्टी सीधी भविष्यवाणी करके अक्सर ग्रामीण जनता को डराकर अपना उल्लू सीधा करते हैं ।
इनमें से कुछ दूसरे स्थानों पर होने वाले यग्य आदि की बात बताकर जनता से पैसे ऐंठ लाते हैं । जबकि यग्य आदि कुछ नहीं होता । कुछ जो इनमें पङे लिखे भी होते हैं । वे किसी दूरस्थ स्थान पर किसी धार्मिक आयोजन
की बात कहकर चन्दा की रसीद काटते हैं । हरि ने बताया कि इनमें से ज्यादातर स्मैक का नशा करते हैं । उदाहरण बहुत से हैं । पर मेरा अभिप्राय ये हैं कि ये साधु गलत हैं या जनता गलत है ? निसंदेह जनता । इनको बङाबा देने वाली जनता ही है । मैं भले ही साधु हूँ । पर परिचित साधु मुझे देखते ही कन्नी काटने की कोशिश करते हैं । क्योंकि एक तो उन्होनें कभी भी मुझे भिक्षा जैसा प्रयोजन नहीं करते देखा । कभी कम्बल लेते नहीं देखा । कभी भन्डारे या उसकी दक्षिणा में शामिल होते नहीं देखा । कभी भन्डारे की पर्ची ग्रहण करते नहीं देखा । उल्टे वे एक बात से भयभीत होते हैं । कि मैं चार लोगों के बीच उनको बुलाकर उनका मत । गुरु । ग्यान । अखाङा । ग्यान में उपलब्धि । गुरु परम्परा । आदि जैसी बातें पूछने लगता हूँ । जिससे वे नावाकिफ़ होने के कारण बेइज्जत महसूस करते हैं ।
इसलिये साधु मुझ साधु को देखकर दूर ही से निकल जाते हैं । अंत में मैं सरल भाषा में एक ही बात कहूँगा । कि किसी भी साधु को एक रुपया भी देने से पहले आप उससे ग्यान से सम्बन्धित कुछ खास प्रश्न पूछें । मोक्ष क्या है । वेदों में क्या है । गीता क्या कहती है । चौथा राम कौन सा है ? यदि साधु हल्के स्तर पर भी अच्छे जबाब देता हैं तो उसे भिक्षा दे दें । बरना तो आप साधुओं के नाम पर भिखारियों की फ़ौज बङा रहें हैं । और उससे ज्यादा खुद जिम्मेवार हैं । बाद में आप लोग शिकायत करते हैं कि आजकल के साधु भ्रष्ट हैं । और अच्छे साधुओं को इसका मुआवजा भरना पङता है । और आप लोग भी अच्छे साधुओं के दर्शन सतसंग आदि से वंचित हो जाते हैं । इसलिये कम से कम भिक्षा देने की धारणा में ही सुधार कर लें । इससे ही आप असली साधुओं के प्रति सच्चा उपकार और साधु सेवा कर लेंगे । " साधु होय तो पक्का होय के खेल । कच्ची सरसों पेर के खली बने ना तेल । "
" जाकी रही भावना जैसी । हरि मूरत देखी तिन तैसी । "
" सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिम हरि शरण न एक हू बाधा । "
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