18 अप्रैल 2010

चौथे महल पुरुष एक स्वामी


चौथे महल पुरुष एक स्वामी । जीव अंश वह अंतरजामी ।
ईश्वर अंश जीव अविनाशी । चेतन अमल सहज सुखराशी ।
करम प्रधान विश्व रचि राखा । जो जस करे सो तस फ़ल चाखा ।
पसु पक्षी सुर नर असुर । जलचर कीट पतंग । सबही उतपति करम की । सहजो नाना रंग ।
धनवन्ते सब ही दुखी । निर्धन है दुख रूप । साध सुखी सहजो कहे । पायो भेद अनूप ।
तन धर सुखिया कोई न देखा । जो देखा सो दुखिया हो ।
उदय अस्त की बात कहतु है । सबका किया विवेका हो ।
घाटे बाढे सब जग दुखिया । क्या गिरही बैरागी हो ।
शुकदेव अचरज दुख के डर से । गर्भ से माया त्यागी हो ।
जोगी दुखिया । जंगम दुखिया । तपसी का दुख दूना हो ।
आसा तृष्ना सबको व्यापे  । कोई महल न सूना हो ।
साँच कहौ तो कोई न माने । झूठ कहा नहि जाई हो ।
बृह्मा विष्नु महेसर दुखिया । जिन यह राह चलाई हो ।
अबधू दुखिया । भूपति दुखिया । रंक दुखी विपरीती हो ।
कहे कबीर सकल जग दुखिया । संत सुखी मन जीती हो ।
कोई तो तन मन दुखी । कोई चित्त उदास । एक एक दुख सभन को । सुखी संत का दास ।
भीखा भूखा कोई नहीं । सबकी गठरी लाल । गिरह खोल न जानही । ताते भये कंगाल ।
नीच नीच सब तर गये । संत चरन लौलीन । जातहि के अभिमान से । डूबे बहुत कुलीन ।
बङे बङाई पाय कर । रोम रोम हंकार । सतगुरु के परचे बिना । चारों वरन चमार ।
पलटू ऊँची जाति को । जन कोई करे हंकार । साहेब के दरबार में । केवल भक्ति प्यार ।
ज्यों तिल माँही तेल है । ज्यों चकमक में आग । तेरा साईं तुझ में है । जाग सके तो जाग ।
ज्यों नैनन में पूतरी । यों खालिक घट माँहि । मूरख लोग न जानहीं । बाहर ढूँढन जाँहि ।
जा कारन जग ढूँढया । सो तो घट ही माँहि । परदा दिया भरम का । ताते सूझे नाहिं ।
दूध मध्य ज्यों घीव है । मिहंदी माँही रंग । जतन बिना निकसे नहीं । चरनदास सो ढंग ।
जो जाने या भेद कूँ । और करे परवेस । सो अविनासी होत है । छूटे सकल कलेस ।
दादू जीव न जाणे राम को । राम जीव के पास । गुरु के सबदो बाहिरा । ताते फ़िरे उदास ।
दूर कहे ते दूर है । राम रहया भरपूर । नैनहूँ बिन सूझे नहीं । ता थे रवि कत दूर ।
कोई दौङे द्वरिका । कोई काशी जाहि । कोई मथुरा को चले । साहिब घट ही मांहि ।
सब घट माहें राम रहया । बूझे बिरला कोइ । सोई बूझे राम को । जो राम सनेही होय ।
काँकर पाथर जोर के । मसजिद लयी चुनाय । या चढ मुल्ला बांग दे । क्या बहरा हुआ खुदाय ।
मुल्ला चढ किलकारिया । अलख न बहिरा होय । जेहि कारन तू बांग दे । सो दिल ही अंदर जोय ।
तुर्क मसीते हिन्दू  । देहरे आप आपको धाय । अलख पुरुष घट भीतरे । ता का द्वार न पाय ।
एक टिप्पणी भेजें