09 मार्च 2010

परमात्मा कहाँ रहता है.?

न मथुरा में ना काशी में । ना मैं कावा कैलाश में ।

मुझको कहाँ खोजे है बन्दे । मैं तो तेरे पास में । 
ना मैं तीरथ ना मैं मूरत । ना मैं वरत उपवास में । 
मुझको कहाँ खोजे है बन्दे । मैं तो तेरे पास में । 
आप सारे शास्त्रों वेद पुराणों का अध्ययन कर लें । गीता । रामायण । भागवत । महापुराण आदि का अध्ययन करेंगे । तो उन सबका एक ही निष्कर्ष निकलेगा कि यदि जीव को आत्मज्ञान की तलाश है । तो उसका एक ही मार्ग है । चक्रों का ध्यान करना । चक्रों को जगाना । जिसे ज्ञान की भाषा में कुण्डलिनी जागरण भी कहा जाता है ।
वास्तव में चक्रों के इस ध्यान को हलके से नहीं लिया जाना चाहिए । और न ही कोई किताब आदि पढकर कोई छोटी या बड़ी साधना करनी चाहिए । क्योंकि इसमें साधक पागल भी हो सकता है । और उसकी मौत भी हो सकती है । मेरे अनुभव में कई लोग ऐसे आये । जिन्होंने मनमाने तरीके से त्राटक । गहरा ध्यान । या मंत्र तंत्र आदि साधना की । और भयंकर दुर्गति को प्राप्त हुए ।
वास्तव में ये साधनायें बहुत सरल हैं । पर इनको सक्षम गुरु की देखरेख में ही करना चाहिये ।
चक्रों की साधना में बहुत तरीके हैं । और इसको सही तरीके से समझने के लिए कम से कम 6 महीनों का सतसंग लेना बेहद जरूरी होता है । बाद में गुरु को समर्पण होकर विधिवत
दीक्षा लेकर साधना आरम्भ करनी चाहिए । तभी साधक मुक्तिमार्ग की यात्रा कर सकता है । एक बात ये भी है कि आत्मा के उद्धार के लिए इसके अतिरिक्त और कोई मार्ग भी नहीं है ।
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